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Patrika Opinion: न्यायिक सुधार की दिशा में सराहनीय पहल

बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानता न्याय के मार्ग में पहले ही आड़े आती रही है। ऑनलाइन मोड की अदालतों का भी कहीं वही हश्र न हो जाए। ध्यान रखना होगा कि न्याय प्राप्त करने के सीमा को तोडऩे वाला यह कदम भी किसी दायरे में न सिमट जाए।

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देश की न्यायिक प्रणाली को डिजिटल और आधुनिक बनाने के लिए पिछले कुछ सालों से क्रांतिकारी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में केरल के कोल्लम जिले में 24 घंटे चलने वाली ऑनलाइन अदालत की शुरुआत न्यायिक सुधार की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश डीवाइ चद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल में हमारी न्याय व्यवस्था को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकाल कर लोकोन्मुखी बनाने के प्रयासों को वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने अदालतों को पारदर्शी और आम लोगों के लिए ज्यादा सुलभ बनाने की नीति के तहत कई बदलाव किए।

जस्टिस चंद्रचूड़ की तरह ही कई अन्य न्यायाधीशों ने भी अदालतों में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। इन प्रयासों के कारण ही ओडिशा जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े राज्य में सभी अदालतें ऑनलाइन मोड में काम करने की स्थिति में आ गई हैं। अन्य राज्यों में भी अभियानपूर्वक ऐसे प्रयास आगे बढ़ाए जा रहे हैं, जो समय और धन की बचत करने के साथ-साथ अदालतों तक आम लोगों की पहुंच को सुलभ बनाने वाले हैं। कोल्लम जिले में शुरू की गई ऑनलाइन अदालत में एक मजिस्ट्रेट और तीन कर्मचारी होंगे। इसमें कहीं से भी केस दायर किए जा सकेंगे। फरियादी, आरोपी, वकील या जज किसी को भी अदालत जाने की जरूरत नहीं होगी। सुनवाई व फैसले के साथ-साथ कोर्ट फीस का भुगतान भी ऑनलाइन होगा। पुलिस को निर्देश देने वाले परिपत्र भी ऑनलाइन ही भेजे जाएंगे। इस सुविधा के बाद घर या दफ्तर में बैठकर भी मुकदमेबाजी की प्रक्रिया पूरी की जा सकेगी। ऑनलाइन प्रक्रिया में दस्तावेजों को डिजिटल रूप में संग्रहित करने से उनके खोने का जोखिम नहीं रहता है। कागजों का इस्तेमाल नहीं होने से प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल तो है ही, भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी कम करेगी। केरल की तरह अन्य राज्यों को भी इस दिशा में सकारात्मक रुख दिखाना चाहिए।

हालांकि, तमाम खूबियों के बावजूद ऑनलाइन अदालत को सर्वसुलभ बनाने के रास्ते में कई अड़चनें हैं जिन्हें दूर किए बिना इसका शत-प्रतिशत लाभ संबंधित पक्षों को नहीं मिलेगा। इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल ज्ञान की कमी और साइबर सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध न होना जैसी कई चुनौतियां हैं जिन्हें दूर किए बिना ऑनलाइन अदालतों का पूरा लाभ नहीं उठाया जा सकता है। बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानता न्याय के मार्ग में पहले ही आड़े आती रही है। ऑनलाइन मोड की अदालतों का भी कहीं वही हश्र न हो जाए। ध्यान रखना होगा कि न्याय प्राप्त करने के सीमा को तोडऩे वाला यह कदम भी किसी दायरे में न सिमट जाए।