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Patrika Opinion: महंगी पड़ेगी जल संकट से उपजे खतरों की अनदेखी

जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर यों तो वैज्ञानिकों से लेकर पर्यावरणविद तक लगातार आगाह करते रहे हैं। लेकिन इस बार तो रेटिंग एजेंसी मूडीज तक ने बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण ज्यादा आबादी वाले शहरों में गंभीर जल संकट की चेतावनी दे दी है।

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जयपुर

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Nitin Kumar

Jun 26, 2024

देश भर में जल प्रबंधन की आवश्यकता बरसों से महसूस की जा रही है। और, बात जब जल प्रबंधन की होती है तो सबसे पहले जरूरत जल संरक्षण की सामने आती है। चिंता की बात यह है कि ‘जल है तो कल है’ जैसे स्लोगन की अनदेखी करते हुए हम पानी के अंधाधुंध दोहन में तो लगे हुए हैं लेकिन इसकी परवाह नहीं करते कि जल हमारे कल के लिए भी चाहिए। जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर यों तो वैज्ञानिकों से लेकर पर्यावरणविद तक लगातार आगाह करते रहे हैं। लेकिन इस बार तो रेटिंग एजेंसी मूडीज तक ने बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण ज्यादा आबादी वाले शहरों में गंभीर जल संकट की चेतावनी दे दी है।

जल संकट की यह चेतावनी इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि मूडीज की ताजा रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पानी की बढ़ती कमी से देश में उद्योग और कृषि क्षेत्र दोनों के ही प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में न केवल लोगों की आय में कमी होगी बल्कि मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी होने से सामाजिक अशांति तक की नौबत आ सकती है। दिल्ली और बेंगलूरु जैसे महानगरों में जल संकट ने काफी पहले से दस्तक दे रखी है। हमारे परम्परागत जलस्रोतों की अनदेखी का नतीजा गांव-शहर सब जगह लोग भुगतने को मजबूर हैं। मूडीज ने अपनी रिपोर्ट का आधार जल संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों को बनाया है। इन आंकड़ों में कहा गया है कि भारत में प्रति व्यक्ति औसत सालाना जल उपलब्धता वर्ष 2031 तक घटकर 1367 क्यूबिक मीटर रह जाएगी। वर्ष 2021 में यह उपलब्धता 1486 क्यूबिक मीटर थी। यह बात और है कि 1700 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति औसत सालाना जल उपलब्धता से कम होने को ही जल संकट मान लिया जाता है। इस बार भीषण गर्मी के दौर में कई इलाकों में जलस्रोत काफी पहले ही सूख गए हैं। इसके बावजूद जलदोहन का काम जारी है। जल संकट और बढऩे वाला है यह अनुमान इसलिए भी आसानी से लगाया जा सकता है क्योंकि हर बार हमारे यहां बरसात का औसत घटता रहा है। इसकी बड़ी वजह हिन्द महासागर का तापमान बढऩे को भी माना जाता है।

जब भी जल संकट के समाधान के प्रयासों पर चर्चा होती है तो यह बात सबसे पहले उभर कर आती है कि प्रकृति ही जल संकट का स्थायी समाधान कर सकती है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे केवल पर्यावरण पर संकट से जुड़े ही नहीं हैं। सामाजिक और आर्थिक संकट के कई रूपों में ये खतरे हमारे सामने आने वाले हैं। ये खतरे सचमुच बड़ी चुनौती होंगे। इसलिए जल संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करने की जरूरत है।