
जनता की फार्मेसी बन रहे हैं जन-औषधि केंद्र
डॉ. मनसुख मांडविया
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, रसायन और उर्वरक मंत्री
वर्तमान में ऐसी बीमारियां बढ़ रही हैं, जिनके उपचार के लिए जीवन भर दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जैसे मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप, इत्यादि। जन औषधि केंद्रों पर ये दवाइयां बाजार दाम से लगभग 50 से 90 प्रतिशत तक सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। इससे मरीजों का काफी खर्चा बच जाता है। हर साल 7 मार्च को जन औषधि दिवस मनाया जाता है, ताकि लोगों के बीच जेनेरिक दवाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। गत दिनों यह दिवस पूरे देश में मनाया गया।
प्रधानमंत्री भारतीय जन-औषधि परियोजना को सरकारी न रखते हुए देश में एक बिजनेस मॉडल के तौर पर शुरू किया गया, जिसके तहत जन-औषधि केंद्रों को रिटेल केंद्र के तौर पर खोलने की शुरुआत हुई। कोई भी व्यक्ति, फार्मासिस्ट, उद्यमी, एनजीओ, ट्रस्ट, सोसाइटी, इंस्टीट्यूशन इत्यादि जन-औषधि केंद्र खोल सकता है। बशर्ते, उसके पास 120 वर्ग फीट की दुकान एवं एक प्रशिक्षित फार्मासिस्ट हो। जन औषधि केंद्र संचालक को सरकार की तरफ से 5 लाख रुपए तक की सहायता राशि दी जाती है, जो कि मासिक बिक्री पर आधारित होती है। यह राशि प्रति माह अधिकतम 15 हजार रुपए तक ही हो सकती है। महिलाओं, दिव्यांगों, सेवानिवृत्त सैनिकों, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, पूर्वोत्तर राज्यों और पर्वतीय क्षेत्रों के आवेदकों को 2 लाख रुपए की वित्तीय सहायता केंद्र तैयार करने के लिए अलग से दी जाती है। इसके साथ ही दवाइयों और अन्य उत्पादों की बिक्री करने के लिए एक सॉफ्टवेयर भी दिया जाता है। इस प्रकार ये केंद्र देश में एक बिजनेस मॉडल के रूप मे स्थापित हुए हैं और रोजगार का एक बड़ा साधन भी बन चुके हैं।
जैसे-जैसे इस योजना का विस्तार हुआ है, यह योजना देश के कोने-कोने में आम आदमी तक पहुंचने लगी है। 2014 में देश में केवल 80 केंद्र इस योजना के तहत कार्यरत थे, जिनकी संख्या बढ़कर 9000 से अधिक हो गई है। यानी पिछले 8 वर्ष में 100 गुना से ज्यादा। सरकार ने हर वर्ष इस योजना के लिए एक लक्ष्य निर्धारित किया और उस पर कार्य किया। वित्तीय वर्ष 2014-2015 में जन औषधि केंद्रों पर होने वाली बिक्री 12 करोड़ रुपए के लगभग थी, वह आज बढ़कर लगभग 1200 करोड़ रुपए पहुंच गई है। इससे मरीजों का बीमारी पर खर्च कम हुआ है। जनता के जन औषधि केंद्रों के प्रति बढ़ते रुझान और मांग एवं उनकी सुविधा को देखते हुए सरकार ने केंद्रों पर मिलने वाले उत्पादों की संख्या भी बढ़ाई है। 2014-15 में केंद्रों पर जहां केवल 300 उत्पाद मिलते थे, आज उनकी संख्या बढ़कर 2039 हो गई है। इसके साथ ही एक और बिंदु पर ध्यान देना आवश्यक है, वह यह है कि इन केंद्रों पर न केवल दवाइयां मिलती हैं, बल्कि अन्य सर्जिकल उत्पाद भी यहां उपलब्ध कराए जाते हैं।
देश भर में जब 9,000 से अधिक जन-औषधि केंद्र खुले, तो इस बात का ध्यान भी रखा गया कि सामान की आपूर्ति में कोई बाधा न आए। सप्लाई चेन को सुलभ बनाए रखने के लिए सरकार ने वेयरहाउस की संख्या में बढ़ोतरी की। 2014-2015 में जहां देश में केवल एक ही वेयरहाउस था, आज देश में 4 वेयरहाउस हैं। यहां मिलने वाली जेनेरिक दवाइयां बाजार से कम दाम पर मिलती हंै, वह भी लगभग 50 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक सस्ती। उदाहरण के तौर पर, कैंसर जैसी बीमारी की महंगी दवा डोसेटेक्सल बाजार में 9,828 रुपए में मिलती है, जबकि यह दवा जन-औषधि केंद्र पर मात्र 1,800 रुपए में मिल जाती है। मरीज के लिए यह बड़ी राहत है। यह एक ऐसी योजना है, जिसने देश के आम जनमानस के जीवन को सीधा प्रभावित किया है और लाखों लोगों के जीवन को बचाया है। यह योजना समुद्र मंथन से निकले उस अमृत के समान है, जिसने देश के लाखों लोगों के जीवन को संवारा है।
प्रधानमंत्री जन-औषधि परियोजना मात्र एक योजना नहीं, यह गरीब व मध्यम वर्ग का एक ऐसा मित्र बनकर उभरी है, जो बुरे वक्त में हमेशा काम आता है। सरकार की सोच राजनीतिक दृष्टि से नहीं चलती, बल्कि समाज को उसका क्या लाभ होगा उसको लेकर चलती है। इस अमृतकाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अगले 25 साल का विजन रखा है, जिसमें हम सभी को एक स्वस्थ और सशक्त भारत का निर्माण करना है। यह योजना भी उसी विजन का एक छोटा-सा हिस्सा है, जो भारत के आम नागरिक को सशक्त करने में बड़ी भूमिका निभा रही है। आइए जन-जन के लिए बनी जनता की फार्मेसी से लोगों को परिचित करवाने का संकल्प लें और 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' की हमारी संस्कृति के वाहक बनें।
Published on:
20 Mar 2023 08:39 pm
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