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निर्बन्ध : सिंहनाद

अकस्मात् ही वह अपने रथ से कूद पड़ा। उसने अपने दोनों नेत्र मूंद रखे थे। वह किसी को भी देख नहीं रहा था। न मित्र को न शत्रु को। उसने अपने सिर को जैसे कंधों पर सिकोड़ कर, दोनों हाथों को छाती पर सुस्थिर कर लिया था।

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afjal khan

Apr 08, 2016

duryodhana and karna

duryodhana and karna

अकस्मात् ही वह अपने रथ से कूद पड़ा। उसने अपने दोनों नेत्र मूंद रखे थे। वह किसी को भी देख नहीं रहा था। न मित्र को न शत्रु को। उसने अपने सिर को जैसे कंधों पर सिकोड़ कर, दोनों हाथों को छाती पर सुस्थिर कर लिया था।

और मन, वायु अथवा गरुड़ के से वेग से वह द्रोण के रथ की ओर दौड़ा। कौरव चारों ओर से उस पर बाणों की वर्षा कर रहे थे। किसी का साहस नहीं हो रहा था कि वह उसके सम्मुख अपना रथ अड़ा दे अथवा अपने खड्ग अथवा गदा से उसका वेग रोक ले।

पर भीम को आज बाणों की कोई चिंता नहीं थी। वह द्रोण के रथ के निकट पहुंच गया था। उसने उनके रथ का ईषादंड थाम लिया। द्रोण डर गए। क्या करना चाहता है भीम।

क्या वह भी धृष्टद्युम्न के समान रथ पर चढ़कर उनका मस्तक काटना चाहता है? किंतु उसके हाथ में तो खड्ग भी नहीं था।

तो क्या वह उनका कंठ दबाकर उनको मार डालना चाहता है? या वह अपने मुष्टिका प्रहार से उनके प्राण लेना चाहता है। पर भीम ने वह सब कुछ भी नहीं किया। वह रथारूढ़ भी नहीं हुआ। उसने ईषादंड को पकड़ा और रथ को जैसे अपनी ओर घसीट ही तो लिया। वह रथ को घुमा रहा था और रथ उसकी भुजाओं के बल से घूम रहा था, जैसे कोई बालक खेल में किसी बड़े आकार के खिलौने को घुमाता है।

रथ के पहिए भूमि से ऊपर उठ गए थे और वह वायु में चक्कर खा रहा था। द्रोण अपने स्थान पर टिककर खड़े भी नहीं हो पा रहे थे कि वे किसी शस्त्र का प्रयोग कर भीम को रथ छोड़ने को बाध्य करते। रथ घूम रहा था और द्रोण किसी प्रकार उससे चिपके हुए थे कि कहीं वे नीचे भूमि पर गिरकर भीम के पैरों तले कुचले ही न जाएं।

और फिर भीम ने द्रोण के उस घूमते हुए रथ को छोड़ दिया। रथ दूर जाकर गिरा। उसकी चपेट में कुछ और रथ भी आ गए, जैसे भीम ने एक रथ से दूसरे रथों को ध्वस्त किया हो। उसकी चपेट में आए कुछ सैनिकों का कचूमर ही निकल गया था।

द्रोण का सारा उत्साह भंग हो चुका था। ऐसे विकट कर्म करने वाले भीम से वे कैसे पार पा सकते थे। भीम को अब किसी की चिंता नहीं थी। वह द्रोण की सेना को पीछे छोड़कर आगे बढ़ गया था। मार्ग में कृतवर्मा की भोजवंशी सेना आई, पर भीम ने अपने वेग से उसे मथ दिया और स्वयं आगे बढ़ गया।

उसने दरदों को भी पार किया। मलेच्छों को परास्त किया। उसको अपने सामने कुछ दूरी पर सात्यकि युद्ध करता दिखाई दे रहा था और उससे भी कुछ दूरी पर स्वयं अर्जुन युद्ध में व्यस्त था। ह्यह्य भीम ने पूरे उत्साह से सिंहनाद किया।

कृष्ण और अर्जुन ने भीम का सिंहनाद सुना। उनके चेहरे खिल गए। अर्जुन ने तत्काल अपना देवदत्त शंख फूंका। सात्यकि ने अपने उत्साह में भयंकर गर्जन किया।

दुर्योधन और उसके मित्र जैसे अपने रथों में अपने पैरों के पंजों पर खड़े हो गए थे। अकेला अर्जुन ही उनसे संभल नहीं रहा था; और अब अर्जुन, सात्यकि और भीम इक_े हो गए थे। वे त्रिकोण बनाकर लड़ेंगे तो कौरव सेना उनको रोक नहीं पाएगी।

जयद्रथ की रक्षा अब कैसे होगी? दुर्योधन ने कर्ण की ओर देखा, कुछ करो। और कुछ नहीं तो किसी प्रकार इस भीम को रोको। कर्ण का मन कैसा तो हो गया था। एक-एक पांडव कौरव सेना के सारे वीरों के लिए यमराज हो जाता है।

दो मिल जाएंगे तो जाने क्या होगा। और प्रत्येक पांडव उसका भाई था। कुंती को वचन दिया था उसने कि वह अर्जुन को छोड़कर और किसी पांडव का वध नहीं करेगा। दुर्योधन यह सब नहीं जानता है। वह उस पर पूर्णत: निर्भर है। दुर्योधन को भीष्म और द्रोण पर भी उतना विश्वास नहीं है, जितना वह कर्ण पर करता है।

क्रमश: - नरेन्द्र कोहली