लड़कपन में नानी जमाने भर के किस्से सुनाती, कहती- लाला! आदमी की जिन्दगानी में कई बार ऐसो चक्कर पड़ै कि बिचारो सोच ही नाय सकै कि काईं करै और किधर कू जावै। इधर गिरै तो कुंओ और उधर गिरै तो खाई। दोनूं तरफ मौत है। ऐसा टाइम हरेक के जीवन में आता है। इसी स्थिति में आदमी असमंजस में पड़ जाता है कि वह करे तो क्या करे ? इन हालात से इन दिनों देश के दो बड़े नेता गुजर रहे हैं? लगाइए।
आप अनुमान लगाइएगा कि वे दो नेता कौन-कौन हो सकते हैं? क्या! राहुल और अरविन्द केजरीवाल? जी नहीं। आपका जवाब एकदम गलत। वे नेता हैं अपने नरेन्द्र भाई मोदी और उनके धुर विरोधी नीतीश कुमार। इनके बारे में हम एक बात साफ-साफ कह सकते हैं कि समकालीन राजनीति में नीतीश और नरेन्द्र भाई दो ऐसे नेता हैं जो खुद सही होते हुए भी गलत लोगों का साथ लेने को मजबूर हैं।
हमारे ख्याल से प्रधानमंत्री के रूप में नमो भाई कभी नहीं चाहेंगे कि वे साक्षी, साध्वी और विजयवर्गीय जैसे ढीठ चेहरों के प्रतिनिधि बने दिखलाई दें। क्योंकि इनकी अनर्गल बयानबाजी ने जितनी भद्द उनकी उड़वाई है उतनी कभी नहीं उड़ी होगी। और जहां तक नीतीश कुमार का प्रश्न है वे लालू प्रसाद के नौंवी फेल, विफल क्रिकेटर पुत्र को उपमुख्यमंत्री बनाते वक्त मन ही मन दुख ही पाए होंगे। बहरहाल मजबूरी का नाम ही 'आज की राजनीति' सही है। लेकिन हम जिस कुएं-खाई की बात कर रहे हैं वह अलहदा है।
पिछले दिनों संविधान चर्चा में बहस का समापन करते हुए प्रधानमंत्री ने बेहद सौहार्दतापूर्ण भाषण किया। उसमें उन्होंने कांग्रेस और विपक्ष पर कोई हमला नहीं किया बावजूद इसके कि विपक्ष ने उन पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। लेकिन उनके इस भाषण के बारे में लोग कमेन्ट कर रहे हैं कि यह एक 'ढोंग भरा' भाषण था। अब प्रधानमंत्री क्या करें।