
पीएमजेएवाइ: ज्यादा अस्पतालों वाले राज्य ही रहे फायदे में
डॉ. नचिकेत मोर
बैन्यन एकेडमी ऑफ लीडरशिप इन मेंटल हेल्थ, चेन्नई में विजिटिंग साइंटिस्ट
डॉ. शुचिन बजाज
देश के वंचित हिस्सों में संचालित मल्टी-स्पेशलिटी हॉस्पिटल चेन के संस्थापक
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प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाइ) वर्ष 2018 में प्रारम्भ की गई थी। इसे लागू हुए पांच वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान 27 करोड़ से ज्यादा बीमा कार्ड जारी किए गए। पूरे देश में योजना में सूचीबद्ध लगभग 27,000 अस्पतालों को औसतन 12,250 रुपए प्रति भर्ती के हिसाब से भुगतान किया गया। यह एक अच्छी योजना है, जिसका जश्न मनाया जाना चाहिए। इसके बावजूद हर कार्यक्रम या योजना में गुण और दोष दोनों होते हैं। इसलिए यह समय समीक्षा करने का भी है ताकि योजना की कमी की पहचान की जा सके और उसमें सुधार किया जा सके।
इस योजना में 27,000 सूचीबद्ध अस्पताल हैं। इनमें से लगभग 20,000 अस्पतालों में ही इसका लाभ मिल रहा है। इनमें से 15,000 अस्पताल तो सार्वजनिक क्षेत्र के ही हैं। हालांकि, अभी औपचारिक रूप से यह आंका नहीं जा सका है, पर तथ्य यह बताते हैं कि ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल उन अस्पतालों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जो योजना का हिस्सा नहीं हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बारे में यह धारणा है कि यह गैर जिम्मेदार है। यह स्थिति भारत की ही नहीं, बल्कि वैश्विक है। प्रदर्शन के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र को वित्तपोषित करने की शुरुआत अस्सी के दशक में यूनाइटेड किंगडम से हुई थी। बाद में थाईलैंड, तुर्किए और हाल में वियतनाम की सरकारों समेत दुनियाभर की सरकारों ने इस दिशा में कदम बढ़ाए। इस बदलाव से सार्वजनिक क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार आया। और यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जब सरकारी अस्पतालों को उनके प्रदर्शन के आधार पर पीएमजेएवाइ के तहत भुगतान किया जाता है, तो भारत में भी कुछ ऐसा ही देखा जा रहा है। वित्तपोषण की सीमा के चलते पीएमजेएवाइ देश के किसी भी हिस्से में अभी तक पूरी क्षमता से आगे नहीं बढ़ी है, लेकिन पैकेज के आधार पर अस्पतालों को भुगतान का सकारात्मक असर हुआ है। उदाहरण के लिए, सफल सर्जरी के बाद अक्सर संक्रमण के चलते अस्तपालों में रहना पड़ जाता है। तयशुदा पैकेज के चलते अस्पतालों को प्रेरित किया है कि वे ऐसे मुद्दों पर ध्यान दें ताकि मरीजों को जल्दी से छुट्टी दी जा सके। गौरतलब है कि पीएमजेएवाइ की पैकेज दरों की काफी आलोचना हुई है। हालांकि वैश्विक साक्ष्य बताते हैं कि कम दर का मतलब यह नहीं कि इलाज की गुणवत्ता भी कम हो। अस्पताल और सभी स्वास्थ्य प्रणालियां नवाचार, लागत में कमी लाकर, अनावश्यक तामझाम छोड़कर और उच्च गुणवत्ता बनाए रखकर इस समस्या का समाधान कर सकती है। जब जापान एक निश्चित मूल्य व्यवस्था में चला गया, स्विट्जरलैंड ने अपना व्यापक स्वास्थ्य देखभाल कानून बनाया और जर्मनी ने सख्त मूल्य नियंत्रण स्थापित किया, तो यह डर था कि उनकी स्वास्थ्य प्रणालियां चरमरा जाएंगी, लेकिन यह डर निराधार साबित हआ। पीएमजेएवाई के तहत दरों का निर्धारण भी सही दिशा में उठाया कदम साबित हुआ। हालांकि, योजना में सूचीबद्ध अस्पतालों में 25 फीसदी से ज्यादा निष्क्रिय हैं और यह संख्या देश के राज्यों में अलग-अलग है। प्रति करोड़ आबादी पर कर्नाटक में 500 से ज्यादा सक्रिय अस्पताल हैं, तो बिहार में ऐसे अस्पताल 60 ही हैं। नतीजा यह है कि यह योजना दक्षिणी राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल तक ही केंद्रित होकर रह गई।
केरल में प्रति लाख आबादी पर 16,000 मरीज भर्ती होते है, तो बिहार में यह आंकड़ा 600 है। उत्तरप्रदेश में प्रति लाख की आबादी पर 18,500 से ज्यादा कार्ड जारी किए गए हैं, जबकि केरल में 21,500 कार्ड जारी हुए। फिर भी, यहां प्रति लाख की आबादी पर भर्ती 1,200 रही। इतना बड़ा अंतर कम आय वाले राज्यों में अस्पतालों की उपलब्धता की कमी को दर्शाता है। इतना बड़ा अंतर कम आय वाले राज्यों में अस्पतालों की उपलब्धता की कमी को दर्शाता है। भारत के 200 से अधिक जिलों में जो उत्तर और उत्तर-पूर्व में हैं, कुल सी-सेक्शन (सिजेरियन- सेक्शन) दर 10 फीसदी से काफी कम है। यह कम दर इन जिलों में गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की मौत की प्रमुख वजह है। इसलिए इन जिलों में सार्वजनिक क्षेत्र के ज्यादा अस्पतालों का निर्माण करने और पर्याप्त कर्मचारियों को नियुक्त करने की जरूरत है।
(द बिलियन प्रेस)
Updated on:
12 Dec 2023 11:21 pm
Published on:
12 Dec 2023 08:25 pm
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