
Patrika Opinion: महिलाओं को पूरा हक दें राजनीतिक दल
महिलाओं को विधानमंडलों में आरक्षण की उम्मीद एक बार फिर जागी है। संसद के नए भवन में हुए पहले सत्र में मंगलवार को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ पेश किया गया। चूंकि अधिकांश राजनीतिक दल इसके पक्ष में हैं, लिहाजा इस विधेयक का पारित होना एक औपचारिकता भर है। विधेयक पारित होने के बावजूद इसका लाभ लेने के लिए महिलाओं को अभी और इंतजार करना पड़ेगा। विधेयक पारित होने के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन होगा। इसके बाद आरक्षण लागू होगा। यानी 1996 में पहली बार पेश आरक्षण विधेयक के व्यावहारिक रूप में लागू होने में अभी तीन चार साल और लगने के आसार हैं। लेकिन, यहां एक सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर महिला आरक्षण विधेयक संसद में लाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या बिना आरक्षण के राजनीतिक दल महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पर्याप्त टिकट नहीं दे सकते?
हर दल महिला उत्थान के लंबे-चौड़े दावे भी करता है और वादे भी, लेकिन जब समय आता है तो महिलाओं को उनका हक नहीं मिल पाता। पिछले लोकसभा चुनाव में कुल 82 महिला सांसद चुनकर आई थी। जिस देश में आधी आबादी महिलाओं की हो, वहां सिर्फ 15 फीसदी महिलाएं ही लोकसभा पहुंचे तो आश्चर्य तो होता ही है। आश्चर्य की बात यह कि 2019 से पहले हुए चुनावों में जीतने वाली महिला सांसदों की संख्या 82 से भी कम रहती आई है। विधानसभाओं के हाल भी कमोबेश लोकसभा जैसे ही हैं। आजादी के बाद हुए पहले सात-आठ चुनावों की बात छोड़ दी जाए तो बीते तीन दशकों में महिलाएं राजनीति में अधिक सक्रिय नजर आने लगी हैं। प्रचार- प्रसार के माध्यमों में बढ़ोतरी के अलावा शिक्षा का प्रसार भी महिलाओं को आगे लाने में सहायक हुआ है।
महिला आरक्षण भले ही तीन-चार साल बाद लागू हो, लेकिन राजनीतिक दल यदि चाहें तो कम से कम 25 फीसदी टिकट तो महिलाओं को दे ही सकते हैं। महिलाओं के संसद और विधानसभाओं में अधिक संख्या में पहुंचने का लाभ देश को अवश्य मिलेगा। शासन चलाने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो उनके खिलाफ होने वाले अत्याचार के मामले भी कम होंगे। सवाल सिर्फ सांसद-विधायक का ही नहीं है, प्रयास होने चाहिए कि मंत्री पद पर भी महिलाओं की भागीदारी बढ़े। राजनीतिक दल ‘आधी आबादी’ को उनका पूरा हक दें, ताकि सामाजिक समरसता का ताना-बाना और मजबूत हो सके।
Published on:
19 Sept 2023 11:15 pm
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