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Patrika Opinion: जातीय सर्वेक्षण पर राजनीति ठीक नहीं

बिहार में जातीय सर्वेक्षण लंबे समय से विवादों में फंसा हुआ था। मामला न्यायालय की चौखट तक भी पहुंचा। आंकड़ों में अन्य पिछड़ा वर्ग का आंकड़ा 63 फीसदी आने से ओबीसी की राजनीति गरमाने वाली है।

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जयपुर

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Nitin Kumar

Oct 02, 2023

Patrika Opinion: जातीय सर्वेक्षण पर राजनीति ठीक नहीं

Patrika Opinion: जातीय सर्वेक्षण पर राजनीति ठीक नहीं

बिहार सरकार ने जातीय सर्वेक्षण के आंकड़े तो जारी कर दिए हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि अब आगे क्या होगा? दो महीने के भीतर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। फिर लोकसभा चुनाव के लिए रणक्षेत्र में मुकाबला होगा। बिहार में जातीय सर्वेक्षण लंबे समय से विवादों में फंसा हुआ था। मामला न्यायालय की चौखट तक भी पहुंचा। आंकड़ों में अन्य पिछड़ा वर्ग का आंकड़ा 63 फीसदी आने से ओबीसी की राजनीति गरमाने वाली है। राजनीतिक दल जातीय राजनीति से परहेज करने के दावे भले ही कितने भी कर लें, लेकिन चुनावी राजनीति जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द ही घूमती आई है। जातीय सर्वेक्षण के आंकड़े जारी होने के बाद आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग जोर पकड़ेगी।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने से उठा राजनीतिक बवंडर राजनीतिक परिदृश्य से ओझल भले ही हो चुका, लेकिन आंच अब तक महसूस की जाती है। आने वाले दिनों में नौकरियों के साथ राजनीति में आबादी के हिसाब से ओबीसी आरक्षण का कोटा लागू करने की मांग तूल पकड़ सकती है। इस मुद्दे पर राय अलग-अलग हो सकती है कि राजनीति में जातीय गोलबंदी होनी चाहिए अथवा नहीं। लेकिन, इस तरह की गोलबंदी से नुकसान तो समाज को ही झेलना पड़ता है। आरक्षण की समीक्षा की मांग अनेक बार उठ चुकी है, लेकिन मुद्दा इतना संवेदनशील है कि कोई भी सरकार ऐसा करने से बचना चाहती है।

यहां सवाल यह भी उठता है कि जातीय सर्वेक्षण के आंकड़े सिर्फ बिहार तक ही सीमित क्यों रहें? क्या समूचे देश में जातीय जनगणना नहीं होनी चाहिए? और यदि हां, तो क्यों नहीं इसके लिए सर्वसम्मति बनाने के प्रयास किए जाएं? मुद्दा जब इतना संवेदनशील हो तो सिर्फ राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि केंद्र सरकार अपनी तरफ से पहल करे। सभी राज्य सरकारों के साथ राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर ऐसा फार्मूला तलाशना चाहिए जो सभी को स्वीकार्य हो। ध्यान यह भी रखना है कि हर मुद्दा आरोप-प्रत्यारोप की चाशनी में डूबा नहीं हो। देश में अनेक मुद्दे सालों से विवादों के झूले में झूल रहे हैं। सभी दल खुले मन के साथ एक टेबल पर बैठें तो इनका समाधान निकल सकता है। आवश्यकता एक-दूसरे पर भरोसा करने की है। बिहार के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़े आने के साथ ही इसका राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ तेज होने वाली है। लेकिन, भाषा का संयम बना रहे। ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए, जिससे टकराव की आशंका पैदा होती हो।