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- ब्रह्मदीप अलूने, शिक्षक
भारत में प्रवासियों, अप्रवासियों, शरणार्थियों और यहां तक कि घुसपैठियों के मानव अधिकारों और मूल अधिकारों को लेकर सियासत जगजाहिर है। असम में तो घुसपैठ की समस्या से वहां की जनसांख्यिकीय संरचना ही बदल गई है, जिससे समूचे क्षेत्र में आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समस्याएं चुनौती के रूप में सामने आ रही हैं। मोटे अनुमान के अनुसार देश में अवैध तौर पर बसे लोगों की संख्या डेढ़ करोड़ तक है।
विभिन्न राजनीतिक दलों के संकीर्ण नजरिए और दलगत स्वार्थों के आधार पर शरणार्थी और घुसपैठियों का सियासी बंटवारा किया जा रहा है। अवैध तौर पर बसे लोगों के जीवन की कठिनाइयों व उनके अधिकारों को लेकर संसद से सडक़ तक चिंता भी जताई जा रही है।
दूसरी ओर जो मूल रूप से इस देश के ही हैं उनके अधिकारों की रक्षा करने में सियासी तंत्र नाकाम साबित होता दिखता है। देश के संसाधनों पर पहला अधिकार उसके नागरिकों का होता है। हमारा संविधान भी इसकी पुष्टि करता है। देखा जाए तो रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में हालात बेहतर नहीं है। आम नागरिक और युवा बेहाल हैं।
इस समय वैश्विक युवा विकास सूचकांक में भारत 183 देशों की सूची में 13३ वें क्रम पर है। रोजगार की तलाश में हर महीने दस लाख नए लोग जुड़ जाते हैं जबकि करोड़ों बेरोजगारों को कैसे रोजगार दें, इस पर अभी तक कोई सफल नीति नहीं बन पाई है।
दुनिया में 86 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं जिसमें सबसे ज्यादा तकरीबन 21 करोड़ भारत के हैं। देश में 40 प्रतिशत बच्चे और 50 फीसदी युवा कुपोषण के शिकार हैं। गर्भावस्था में स्वास्थ्य कारणों से प्रत्येक 12 मिनट में एक महिला की मौत हो जाती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 1.53 लाख बच्चे भीख मांगने को मजबूर हैं। देश में महिला आबादी 48.5 फीसदी है लेकिन उनसे भेदभाव बदस्तूर जारी है। भारत में अमूमन हर आधे घंटे में एक किसान अपनी जान दे देता है।
संविधान के अनुच्छेद 42 और 43 से स्पष्ट है कि राज्य के द्वारा काम के लिए न्यायपूर्ण और उचित वातावरण, बेहतर मजदूरी, अच्छा जीवन स्तर का अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। अफसोस है कि सरकारें और सियासी दल अपने देश के नागरिकों की बेहतरी के लिए इतने मुखर कभी नहीं होते जितने वे परदेस के नागरिकों को लेकर संजीदा दिखाई दे रहे हैं।

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