
Indian Parliament
भारतीय संसद के वर्तमान सत्र में कामकाज का ठीक से चलना स्वागत योग्य और अनुकरणीय है। भारत राष्ट्र की सर्वोच्च पंचायत में जिस तरह से पिछले सत्र में हंगामा हुआ था, उसकी वजह से लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थीं। बजट सत्र २०१८ में लोकसभा मात्र ४ प्रतिशत और राज्यसभा मात्र ६ प्रतिशत उत्पादक रही थी। भारत जैसे महत्त्वपूर्ण और सदा सक्रिय विकासशील देश में संसदीय कामकाज का यह आंकड़ा निंदनीय और शर्मनाक ही कहा जाएगा। लोकसभा या राज्यसभा का चयन ४ या ६ प्रतिशत कार्य करने के लिए तो कतई नहीं किया जाता। आज यह खुशी की बात है कि संसद के वर्तमान सत्र में ठीक कामकाज हो रहा है, चर्चा हो रही है, विधेयक पास हो रहे हैं। संसद में विधायी कामकाज को सही रीति-नीति से चलाने-चलवाने के लिए प्रेरित सांसदों का यथोचित स्वागत है।
लोकसभा और राज्यसभा, दोनों ही सदनों के सदस्यों को समान रूप से अपनी उत्पादकता पर विचार करना चाहिए। देश जब आजाद हुआ था, तब संसद में प्रतिवर्ष १०० से ज्यादा दिन का कामकाज होता था। वर्ष १९५६ में तो लोकसभा ने रिकॉर्ड १५१ दिन कार्य किया था। इस वर्ष २०१८ में अब तक मात्र ३०-३१ दिन ही कार्य हो पाया है। यह देश की सबसे दुखद और सबसे बड़ी गिरावट है, यह गिरावट देश में हो रही नैतिक गिरावट से भी ज्यादा चिंताजनक है। विगत दो दशक से प्रति वर्ष ६०-७० दिन ही संसद में कार्य हो पा रहा है। नतीजा सामने है, वर्तमान सत्र की जब शुरुआत हुई, तब ६८ विधेयक इंतजार में थे। कई आवश्यक कार्य या निर्णय ऐसे हैं, जो सत्र दर सत्र लंबित चले आ रहे हैं। वर्ष २०१४ के बाद से संसदीय गिरावट केन्द्र सरकार के लिए बड़ी चिंता का विषय होनी ही चाहिए। इस विषय को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सर्वश्रेष्ठ सांसद सम्मान समारोह में उठाया था। उसके बाद यह अच्छा संकेत है कि संसदीय कामकाज में उत्साह बढ़ा है, हंगामे, टोकाटाकी, नारेबाजी, बहिर्गमन में कमी आई है। भाजपा के नेतृत्व वाली वर्तमान राजग सरकार को चालू सत्र के बाद संभवत: दो सत्र और मिलेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि संसद में ठीक से काम हो। प्राथमिक जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है, उसे हर संभव सकारात्मक प्रयास करने चाहिए।
इस अच्छे मानसून सत्र के बीच, एक उल्लेखनीय निजी विधेयक राज्यसभा में पेश हुआ है, जिसे विधि में बदलने का देश स्वागत करेगा। शिरोमणि अकाली दल के सांसद नरेश गुजराल ने संसद (उत्पादकता बढ़ोतरी) विधेयक २०१७ पेश किया है। इसके अनुसार प्रति वर्ष १२० दिन संसद में कार्य करना अनिवार्य हो जाएगा। इसके अलावा संसद में प्रति वर्ष १५ दिन देश के लिए सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर केवल चर्चा होगी। वाकई संसद में चर्चा या विमर्श बहुत जरूरी है, अच्छे तार्किक तथ्यपरक विमर्श से देश की सर्वोच्च संसद में दबाव और तनाव कम होगा, राजनीतिक मतभेद और परस्पर विद्वेष में कमी आएगी। सर्वोच्च पंचायत ढंग से काम करेगी, तो उसका प्रभाव पूरे राष्ट्र पर दिखेगा। देश के लोग तो चाहते ही यही हैं कि हमारे सांसद अपनी सार्थकता सिद्ध करे।

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