राजस्थान के जैसलमेर-बाड़मेर जिलों की हकीकत
लम्बे-चौड़े वादे करने वाली सरकारों को आईना दिखाने के लिए पर्याप्त है। काम इकन्नी
का और ढिंढोरा सोलह आने का पीटने की परम्परा निभाने वाली सरकारें अपने गिरेबां में
कभी झांकना ही नहीं चाहती। आजादी के सात दशक बाद भी स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के
लिए अगर न्यायालयों को आदेश पारित करने पड़ें तो यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि
सरकारों का विश्वास काम से अधिक उसके बखान में रहता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य
में फ्लोराइड एवं दूषित पानी से राहत दिलाने के लिए आरओ प्लांट लगाने के आदेश दिए
हैं। आजादी के इतने सालों बाद भी देश के किसी हिस्से में लोगों को पीने का स्वच्छ
पानी भी नसीब नहीं हो पाना सरकारों के विकासशील दावों की पोल खोलने के लिए पर्याप्त
है। भोजन, पानी और दवा इंसान की मूलभूत आवश्यकताएं हंै जिनाके बिना वह जीवित नहीं
रह सकता। राजस्थान ही नहीं देश के अनेक राज्यों में आज भी स्वच्छ पेयजल लोगों की
पहुंच से दूर है।
हर चुनाव से पहले वादे करना और जीतने के बाद सत्ता सुख भोगना जब
राजनीतिक दलों का मूल मंत्र बन चुका हो तो मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने का ध्यान
किसे रह जाता है? फ्लोराइड युक्त एवं दूçष्ात पेयजल के सेवन से देश में लाखों लोग
आज भी अनेक बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। पेयजल योजनाओं के नाम पर अरबों-खरबों
रूपए व्यय होने के बावजूद न्यायालय का दखल देना दर्शाता है कि सरकारें इसे लेकर
गंभीर नहीं हैं। न्यायालय में कोई ना कोई बहाना बनाकर हर सरकारें अपनी जिम्मेदारी
से बचना चाहती हैं। पानी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकारों का रवैया इतना
असंवेदनशील है तो सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उसकी
कार्यशैली का अंदाजा ही लगाया जा सकता है।
जैसलमेर और बाड़मेर जिलों में बांधों और
तालाबों की कमी है और पेयजल के लिए लोगों को ट्यूबवैलों पर ही निर्भर रहना पड़ता
है। इन दोनों जिलों के अनेक ऎसे गांव हैं, जहां दूसरे गांवों के लोग अपनी लड़कियों
की शादी करने से हिचकते हैं। किसी भी निर्वाचित सरकार के लिए इससे बड़ी नाकामी क्या
हो सकती है कि वह अपनी जनता को स्वच्छ पेयजल भी उपलब्ध नहीं करा सके। उच्च न्यायालय
के आदेश के बाद सरकार को केन्द्र सरकार से बातचीत करके लंबित पड़ी योजनाओं के
निराकरण की दिशा में पहल करनी चाहिए। ध्यान इस बात का भी रखने की जरूरत है कि
भविष्य में इस तरह की समस्या के निराकरण के लिए किसी को न्यायालय नहीं जाना
पड़े।