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गाली पुराण

एक 'गाली कोश' बनाया जाए जिसमें भांति-भांति की गालियों का संग्रह हो। जो प्रकाशक उसे छापेगा, करोड़पति हो जाएगा। 

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Moti ram

Jun 25, 2015

बात सन् उन्नीस सौ छप्पन की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू चुनाव सभा में आए। कांग्रेस का उम्मीदवार बड़ा खुश लेकिन पंडित जी भाषण में बोले- लोकतंत्र में विरोध जरूरी है। हम विरोधियों का सम्मान करते हैं। हम भी इंसान हैं। गलती कर सकते हैं।

विरोधियों को हक है कि वे हमारी गलतियां बताएं। बेचारा उम्मीदवार समझ नहीं पाया कि वे इस सभा में उसका प्रचार कर रहे हैं या विरोधी का। उस जमाने में यह संभव था। लेकिन आज विरोधी की आवाज को सत्ताधारी कितना महत्व देते हैं, यह सभी जानते हैं।

वे दिन हवा हुए जब नरसिम्हाराव ने कश्मीर के मुद्दे पर अटल बिहरी वाजपेयी को भारतीय दल का मुखिया बनाकर संयुक्त राष्ट्र में भेजा था। आज लालजी अपने दल के प्रधानमंत्री को ही नसीहत देते हैं कि वे अटल जैसे नम्र बनें।

नम्रता, उदारता, सहिष्णुता यह सब भारतीय राजनीति से नदारत हो गई है। अब तो सफला नेता वह माना जाता है जो छिछली जुबान से विरोधी नेताओं को जितनी गाली दे सके। पिछले दिनों एक भगवा नेता ने बिहार में सोनिया गांधी के लिए क्या-क्या शब्द इस्तेमाल नहीं किए। लेकिन पटना से दिल्ली तक किसी भी बड़े नेता ने उसे नहीं टोका कि भाई ऐसे कैसे बोल रहे हो।

ऐसी भाषा तो रावण ने सीता के लिए भी इस्तेमाल नहीं की थी। विरोधी कौन से कम हैं। उन्हें भी जुबान पर काबू नहीं। ऐसे-ऐसे संवाद बोलते हैं कि पूछो मत। कामरेड सीताराम येचुरी को तो लोग बड़ा ही सुलझा आदमी मानते हैं लेकिन महासचिव बनते ही उन्होंने योग क्रियाओं की तुलना श्वान की हरकतों से कर डाली। अरे भाई नास्तिको कोई और तुलना नहीं सूझी।

अब तो इसी में सबका भला है कि राजनीति में 'गाली गलौंजÓ को मान्यता दे देनी चाहिए। जैसे चौराहे पर मवाली बकते हैं, उसी स्तर की जुबान सदनों में बोली और सुनी जाने लगी है। एक तो ससमाज की बलिहारी। इसमें ज्यादातर गालियां मां बहनों से जोड़कर रची गई है। क्या 'पुरुषोंÓ को लेकर गाली की रचना नहीं हो सकती? हमारी तो इच्छा है कि एक 'गाली कोशÓ बनाया जाए जिसमें भांति-भांति की गालियों का संकलन हो।

जो भी प्रकाशक उसे छापेगा वह करोड़पति हो जाएगा। सड़क छाप पीली किताब की तरह यह भी बेस्ट सेलर होगी। सभी राजनीतिक दल इसे लेना चाहेंगे। हो सकता है एकाध घिसे पिटे दल तो यह शर्त भी लगा दें कि जिसने 'गाली कोशÓ का सांगोपांग पाठ किया है वही उसकी सदस्यता के लिए सिफारिश करे। इस कोश के निर्माण में हमारे विद्वान राजनेताओं के मुख से निकले पवित्र शब्दों का बड़ा योगदान रहेगा।

क्योंकि कुछ तो ऐसे हैं जो दिन में अपने विरोधियों को सौ पचास गालियां नहीं दे देते, उनकी रोटी हजम नहीं होती। वैसे अपने नमो आजकल कुछ शांत हैं। चुनावों के दौरान वे भी कमाल का बोले थे। संभवत: अभी 'ललितासनÓ पर हैं। मौन टूटते ही उनके मुखारविंद से भी फूल झरेंगे।

- राही