16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सृष्टि का गूढ़ रहस्य, प्रकृति और पुरुष की सहज परिभाषा’ प्रकृति – पुरुष ही क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ’ पर प्रतिक्रियाएं

Reaction On Gulab Kothari Article : पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विशेष लेख -' प्रकृति - पुरुष ही क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ' पर प्रतिक्रियाएं

2 min read
Google source verification

Reaction On Gulab Kothari Article : प्रकृति की ओर से पुरुष को बलवान बनाने के पीछे के आधार पर प्रकाश डालते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला ' शरीर ही ब्रह्मांड' के आलेख 'प्रकृति - पुरुष ही क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ' को प्रबुद्ध पाठकों ने सृष्टि के गूढ़ रहस्य से रुबरू करवाने वाला बताया है। उनका कहना है कि लेख प्रकृति और पुरुष को सहजता से परिभाषित करने वाला है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से…

मानव जीवन में ईश्वर और प्रकृति का नियम समान हैं। ये किसी से भेदभाव नहीं करते। संसार में विधाता ने जिस किसी भी वस्तु या जीव की रचना की है, वह अपने अलग विशिष्ठ महत्व रखता है। इसमें पुरुष का भी विशिष्ठ महत्त्व माना गया है। इसके कई तार्किक मजबूत पक्ष हैं। बाल, युवा, वृद्ध तीनों दौर में इनके संरक्षण का दायित्व पिता,पति व पुत्र पर रहता है। समाज व परिवार में पुरुष के महत्त्व को गुलाब कोठारी ने बेहद प्रभावी तरीक से वर्णित किया है।
डॉ.संगीता बिले, प्राचार्य, शासकीय कॉलेज हरदा

गुलाब कोठारी ने सही कहा है कि पुरुष भीतर सौम्य होता है और उसका मन संकल्पित नहीं रहता है। वहीं महिला मन से संकल्पित होती है। लेकिन आज खराब अन्न की वजह से स्थिति भी विपरीत होती जा रही है। बढ़ते जंक फूड के चलन की वजह से इंसान का सात्विक मन खत्म हो रहा है।
जयंती सिंह, लेखिका, सागर

मानव शरीर पांच तत्त्वों से मिलकर बना है। इसमें पुरुष व महिला की प्रकृति अलग-अलग होती है। सृष्टि के संचालन में महिला-पुरुष दोनों की सहभागिता जरूरी है। मानव जीवन में जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। योनि भी वैसी ही प्राप्त होती है। शरीर ही ब्रह्मांड में प्रकृति-पुरुष ही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ लेख के माध्यम से गुलाब कोठारी ने मानव जीवन के बारे में सूक्ष्मता से जानकारी दी है।
अजय ठाकुर, समन्वयक, नेहरु युवा केंद्र, बालाघाट

आपके भीतर जो भी ज्ञान है, वह आपके व्यवहार में परिलक्षित होता है। आप प्रकृति से जो कुछ भी सीखते हैं, उसे स्त्री और पुरुष की संज्ञा में पिरोहित करके समाज में परिलक्षित करते हैं। पुरुष और स्त्री में प्राकृतिक संतुलन रहता है। इससे छेड़छाड़ इस संतुलन को बिगाड़ देती है। गुलाब कोठारी के आलेख में प्रकृति और पुरुष को बड़ी ही सहजता से परिभाषित किया गया है।
बृजभूषण शुक्ला, साहित्यकार, खंडवा

प्रकृति और पुरुष के बीच अन्योन्याश्रित संबंध है। इन दोनों के संसर्ग से ही सृष्टि का विकास चलायमान है। प्रकृति निष्क्रिय और पुरुष सक्रिय है। कोठारी ने बहुत ही बारीकी से इसका वर्णन किया है। इसका गहन आध्यात्मिक वर्णन काबिले तारीफ है।
प्रो अशोक नेमा, भोपाल

मनुष्य अपने कर्म अनुसार ही अलग-अलग योनियों का भोग करता है। स्त्री और पुरुष भी इसके ही रूप हैं। प्रत्येक पुरुष व स्त्री में अग्नि व सोम दोनों विद्यमान रहते हैं। पुरुष के भीतर सौम्य होता है अत: उसका मन संकल्पित नहीं रहता है, जबकि स्त्री शरीर भीतर आग्नेय है। उसके मन का संकल्प दृढ़ होता है। इंसान का शरीर तो सिर्फ दर्पण मात्र ही है, जिसमें अलग-अलग काया आती-जाती रहती है।

गौरव उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर

प्रकृति-पुरुष को तात्विक रूप से जानना ही ज्ञान है। प्रकृति कामना है, कर्म में प्रवृत्त करती है। कोठारी ने अपने लेख में जिस तरह से प्रकृति, पुरुष और जीव के कर्मों की व्याख्या की है, वह निश्चित रूप से इस सृष्टि का गूढ़ रहस्य है। जीव जब तक प्रकृति तत्त्व को नहीं समझेगा, तब तक उसे आध्यात्मिकता का अनुभव नहीं होगा।
डॉ. देवेंद्र सिंह तोमर, साहित्यकार, मुरैना