
Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group
Reaction On Gulab Kothari Article : रावण, विश्वामित्र, वाल्मीकि और जैन तीर्थंकरों के वर्ण परिवर्तन के उदाहरणों के साथ अच्छे कर्म और इसके लिए सात्विक भोजन ग्रहण करने की आवश्यकता पर बल देते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला 'शरीर ही ब्रह्मांड' के लेख 'अन्न से वर्ण परिवर्तन' को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उन्होंने कहा है कि आलेख दर्शाता है कि अन्न ब्रह्म की पुन: प्रतिष्ठा ही सुख की स्थापना है और इसके लिए सात्विक भोजन जरूरी है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से...
लेख में गुलाब कोठारी ने अन्न की विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक रूप से अन्न के महत्व को समझाया है। मानव जीवन में अन्न का काफी महत्त्व है। एक कहावत है जैसा खाए अन्न, वैसा हो मन। सात्विक भोजन करने से मन में सात्विक गुण ही आते हैं। तामसिक भोजन करने से मन में न केवल तामसिक विचार आते हैं, बल्कि गुण भी तामसिक हो जाता हैं।
डॉ अंकित असाटी, आयुष चिकित्सक, बालाघाट
कोठारी ने अन्न का जो महत्त्व बताया है, वह समझने योग्य है। शास्त्रों में भी अन्न को ब्रह्म कहा है।
सुनंदा गावंडे, साहित्यकार, बुरहानपुर
अन्न का मानव जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। अन्न से सात्विक मन, बुद्धि, व कामना जाग्रत होती है। इसका आध्यत्मिक महत्त्व है। यज्ञ से अन्न देवताओं को पहुंचाते हैं। तप से ज्ञानाग्नि पैदा कर कर्मों को जलाती है। दान देकर ऋण से मुक्त होते हैं। यही शास्त्र सम्मत जीवन का चक्र है।
विकास दशोत्तर, ज्योतिषाचार्य, रतलाम
आलेख हमें सात्विक भोजन की ओर प्रेरित करता है, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अन्न को ब्रह्म की संज्ञा दी है। जन्म से तो हम सभी शूद्र हैं। कर्म के आधार पर ही हमारा वर्ण तय होता है। अगर हम सात्विक भोजन करेंगे तो आयु, बल, बुद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होगी। भोजन का मन से सीधा संबंध है। सात्विक भोजन से हम अपने मन और वर्ण को बदल सकते हैं।
डॉ नीरज जैन, शिक्षक, दतिया
आलेख में अन्न को ब्रह्मकहा गया है। आलेख में सात्विक भोजन के गुणों को बताया गया है कि सात्विक भोजन से किस तरह से हम अपने शरीर और बुद्धि को बदल सकते हैं। वहीं अन्य भोजन की तुलना में सात्विक भोजन कितना लाभकारी है। उसका उल्लेख भी विस्तृत तरीके से है।
आशुतोष शर्मा, साहित्यकार, शिवपुरी
लेख में अन्न से शरीर और ब्रह्मांड की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि अन्न ही ब्रह्म है। अन्न का पोषण चंद्रमा से होता है। इसलिए अन्न से ही मन का निर्माण हुआ है जो हमें सात्विक भोजन के लिए प्रेरित करता है। यह सही है कि जैसा भोजन शरीर को देंगे, वैसे ही विचार मन में आएंगे।
गंभीर सिंह, उद्यानिकी, भिण्ड
शास्त्रों में अन्न को ही ब्रह्म कहा गया है। यही वजह है कि सात्विक भोजन हमेशा से पसंद किया जाता रहा है। ऐसा कहा जाता है कि 'जैसा खाओगे मन वैसा रहेगा मन।' हमारी वर्ण व्यवस्था में भी अन्न का वर्णन मिलता है। अन्न से ही वर्ण व्यवस्था में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।
गौरव उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर
गुलाब कोठारी का लेख ' अन्न से वर्ण परिवर्तन' एक अलग विचार को व्यक्त करता है। गीता के श्लोक से आए इस लेख को काफी गहराई से समझाया गया है, जिसमें मूल तत्त्वों को बताया गया है। यह निश्चित ही इच्छाशक्ति और अभ्यास की निरंतरता पर निर्भर करता है।
ब्रजेंद्र शर्मा, रिटायर्ड सहकारिता अधिकारी, सागर
लेख में वर्ण व्यवस्था की जो व्याख्या प्रस्तुत की है, वह मनुष्य को प्रकृति से जोडऩे का सारगर्भित प्रयास है। सचमुच में वर्ण संस्कारित समाज का प्रतिफल है। गीता में भी प्रकृति और संस्कारों को प्रमुख बताया गया है।
डॉ. विवेक द्विवेदी, वरिष्ठ साहित्यकार, रीवा
'जैसा खाए अन्न वैसा हो मन', इस कहावत को गुलाब कोठारी ने तथ्यों व उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया है। आम जन को लेख पर अमल करने की जरूरत है।
डॉ. अश्विनी तिवारी, अध्यक्ष जिला योग, समिति सिंगरौली
Published on:
30 Sept 2023 06:20 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
