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मन में उपजने वाली धारणाओं का विश्लेषण-“ह्रदय और मन” पर प्रतिक्रियाएं

Reaction On Gulab Kothari Article : पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विशेष लेख -"हृदय और मन" पर प्रतिक्रियाएं...

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Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group

Reaction On Gulab Kothari Article :ह्रदय और मन के संबंध व अंतर को गहराई से रेखांकित करते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला "शरीर ही ब्रह्मांड" के आलेख "हृदय और मन" को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उन्होंने कहा है कि लेख मन और मन में उपजने वाली धारणाओं को विस्तार से समझाने वाला है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से...


वास्तव में जो पूर्णब्रह्रम है और जो ऊर्जा रूप में है, वही ब्रह्मांड है। यह सच है की मन की अपनी मर्जी और बुद्धि का अहंकार होता है । बुद्धि सूर्य संस्था से और मन का संबंध चंद्रमा से है ।चंद्रमा ही मन का कारक माना गया है। मन प्राण और शरीर मिलकर ही आत्मा कहलाते हैं। कामना से उत्पन्न परिणाम ही मनुष्य को 84 लाख गतियों का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसी कारण कामना के लिए विषय का ज्ञान होना भी आवश्यक है ।
बुधराज नाहर , जोधपुर

प्रत्येक प्राणी ब्रह्म है और एक कामना लेकर पैदा होता है। यही कामना ही कर्म और कर्म फल का आधार भी है। भक्ति में श्रद्धा समर्पण ज्ञान वैराग्य और कर्म है जो गुरु कृपा से ही संभव है । एकमात्र गुरु ही ईश्वर और भक्ति के हृदय स्थलों को जोड़ कर कामना से मुक्ति और मन का निग्रह कर आनंद की उच्च अवस्था से साक्षात्कार करा सकते हैं।
पवन शर्मा, सूरसागर जोधपुर

मन चंचल होता है, बार -बार इच्छाओं में वृद्धि करता है। आज के आलेख में यही बताया है। इच्छा पूर्ण होने पर हृदय निर्मल होता जाता है। हर व्यक्ति में अपनत्व जागृत होने लग जाता हे। प्रेम वश भगवत प्राप्ति होने लगती हे सब में ईश्वर के दर्शन होता है। माया से दूरी और मोक्ष का मार्ग प्राप्त हो जाता है।

स्वामी नरहरिदास , बालानंद मठ जयपुर

मन और हृदय एक गतिमान होने लग जाता है तो दोनो ही वैराग्य उत्पन्न होता वैराग्य उत्पन होने पर जिज्ञासा समाप्त हो जाति हे मन शांत होता है। हृदय निर्मल होता हे सभी के भले के लिए अच्छे विचार आने लग जाते हे अपने आप मन और हृदय से मिलने वाले लोग मिलने लगते ही और आनद की प्राप्ति होने लगती हे ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है। जिज्ञासा समाप्त होने लग जाती हे ज्ञान वेरागाय एक हो कर भक्ति जागृत हो जाती है।
ओमदास(कोतवाल), जटवाड़ा जयपुर

आनंद पैदा करता है हृदय और मन। शरीर जिसके पास है उसके पास हृदय और मन दोनों है और जहां हृदय और मन है, वहां बुद्धि है, ज्ञान है, व्यक्ति की कामनाओं की पूर्ति के लिए मन का होना बहुत जरूरी है ।हृदय की शक्ति दुर्गा तो कहलाती है परंतु ह्रदय ही मन है मन ही हृदय है, भक्ति ज्ञान परंपरा से आती है, श्रदा समर्पण है। इन सब बातों के लिए मन का होना बहुत जरूरी है।
राजेन्द्र जोशी, बीकानेर

जीवन में कामना के कारण ही मनुष्य कर्म करता है। कामना ही वह कारक है जो अच्छे-बुरे का भेद करने की क्षमता को भी समाप्त कर देती है। कामना मन में उत्पन्न होती है। इसी कामना के फलस्वरूप हर व्यक्ति आसक्त होता है। जो इस पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसे किसी से मोह नहीं रहता है। राग-द्वेष समाप्त हो जाते हैं। हर कामना पूरी हो यह आवश्यक नहीं है, लेकिन उसे पूरा करने के लिए हर कोई दौड़ता रहता है।
ललित कुमार, पाली

भारतीय संस्कृति में भक्ति को बहुत महत्व दिया गया है। क्योंकि यह समझाया गया है आज के आलेख में भक्ति में ज्ञान, श्रद्धा, समर्पण व वैराग्य है। जो मनुष्य को ह्दय से जोड़ते हैं। भक्ति के मार्ग पर ले जाते हैं गुरु। जिनका पूजन हमारी संस्कृति में भगवान से भी पहले किया जाता है। गुुरु ही शिष्य को कामना से मुक्ति दिलाने का मार्ग बताते है। यही मार्ग भक्ति के पथ पर अग्रसर करता है।
सरला व्यास, पाली

आलेख में हृदय और मन का अच्छा विश्लेषण किया गया है। मन चंचल होता है और उसमें नित नई इच्छाएं पैदा होती रहती हैं। इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए व्यक्ति को कर्म करना जरूरी है। कर्म तभी सार्थक होगा जब वह पूरे मन से किया जाए। इसके लिए हृदय में भावनाएं होना भी जरूरी है।
विजय जोशी, भोपाल

मन की इच्छाएं पल-पल बदलती रहती हैं। इसे काबू में करने का एक ही रास्ता है अध्यात्म, जिस पर आज का मनुष्य चलना ही नहीं चाहता। मन भौतिक इच्छाओं के वशीभूत होकर उसे पाप के रास्ते तक ले जाने में लगा है। इच्छाएं ही मन को विचलित करती हैं। मन का चंद्रमा कभी दमकता है तो कभी अमावस की तरह अंधकारमय होकर उदास रहने लगता है। ऐसे में मन की स्थिति को समझना खुद मनुष्य के हाथ में नहीं रह गया है। योग, ध्यान, अध्यात्म ऐसे रास्ते हैं, जिनके माध्यम से मन का सही उपयोग किया जा सकता है। जो इसे अपना रहे हैं, वे तरक्की की नई इबारतें लिख रहे हैं। लेख में प्रस्तुत विषय युवा पीढ़ी के लिए बहुत उपयोगी है। उन्हें अपने मन में होने वाली हलचल और उसे नियंत्रित करने का मार्ग भी मिल सकता है।
पायल चौरसिया, मनोविज्ञानी, जबलपुर

मन और मन में उपजने वाली धारणाओं को विस्तार से समझाता यह कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। हम तो कहते भी हैं कि 'मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत।' मन हमारी आत्मा का केंद्र यक्षबिंदु है। मन से ही तन की सभी क्रियाएं संचालित होती हैं। मन की विशद व्याख्या करता यह आलेख पौराणिक संदर्भों के साथ ही आधुनिक उदाहरणों को भी प्रस्तुत करता है। मनुष्य की प्रवृत्तियां और उसकी लालसाओं के बीच मन की स्थिति और उससे होने वाले प्रभावों को इसमें संदर्भ सहित विश्लेषण किया गया है।
आशीष दशोत्तर, साहित्यकार, रतलाम

आलेख में मन और हृदय के बारे में जो व्याख्या की गई है, वह बहुत ही पठनीय है। मन इच्छा के साथ पैदा होता है। इच्छा पूर्ति के साथ मर जाता है। हृदय अक्षर है, स्थायी है। गीता के सार के साथ कोई भी बात समझाने का बहुत अच्छा तरीका है। भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, मनुष्य की सभी बात इसमें समहित हैं।
जयवंत नागड़ा, रचनाकार, बुरहानपुर

मन के तीन प्रकारों इन्द्रिय मन, सर्वेन्द्रिय मन महन्मन और तीन शरीर व प्राणों की तीन गति, चार प्रकार की कामनाएं को समझाते हुए जीवन के चरमोत्कर्ष के लिए हृदय के भीतर जाने के महत्त्व को भी आलेख में प्रतिपादित किया गया है। आनंद की उच्च अवस्था यानि अ-मन का सही अर्थ समझकर ही जीवन के आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्राप्त किया जा सकता है।
आभा खरे, छतरपुर

हम यह सुनते आए हैं कि हमेशा अपने 'दिल की सुनें। आलेख से भी यह अनुभव हुआ कि हृदय और मन को वश में करना आसान नहीं है। मन में इच्छा जागृत होती है और फिर खत्म हो जाती है। फिर दूसरी इच्छा जागृत हो जाती है। यही क्रम अंत तक चलता रहता है। ह्रदय को समझने की जरूरत है। माना जाता है कि हृदय में ईश्वर का वास होता है। ईश्वर से जुड़े रहने के कारण सही निर्णय लेने की क्षमता मन से अधिक हृदय में होती है।
कमलेश मिश्रा, मंडला

मन चंचल होता है। इच्छाओं के अनुसार परिवर्तन मन की प्रवृत्ति है। जबकि बुद्धि स्थिर होती है। लेख में मन और बुद्धि की स्थिति को स्पष्ट किया गया है। सृष्टि रचना में मन और बुद्धि का स्थान स्पष्ट करने के साथ लेख में कई ऐसे तथ्य समाहित हैं जो पाठकों के लिए नवीन ज्ञान है।
अनुराग सिंह, प्राध्यापक देवसर, (सिंगरौली)

ईश्वर ने इंसान में मन रूपी बीज का रोपण किया है। यही मन उसकी इच्छाओं को पैदा करता है। इच्छाओं की पूर्ति होते ही यह मन मृत प्राय: हो जाता है। हर तरह की कामनाएं पूरी करने लायक नहीं होती हैं, फिर भी कई बार इंसान ऐसी कामनाओं की भी पूर्ति करता है।
जीएम हिंगे, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर