
Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group
Reaction On Gulab Kothari Article : बलपूर्वक खींचकर पापकर्म में लगाने वाली शक्ति को काम के रूप में निरूपित करते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला शरीर ही ब्रह्मांड के आलेख ' काम ही पापों का प्रायोजक' को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उन्होंने कहा है कि लेख कामना की पूर्ति को ही जीवन का आधार बना देने से बचने की सीख देने वाला है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से...
मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ पाने की लालसा रखता है, लेकिन पिछले और वर्तमान के कर्म उसे सद्मार्ग की तरफ बढ़ने नहीं देते। उसे अपने मन की कामनाओं की पूर्ति के लिए कई बार न चाहते हुए भी बुरे कर्म करने पड़ जाते हैं। गुलाब कोठारी का लेख आज के परिदृश्य पर एक दम सही है। दिशा देने वाला है। गीता के सार की तरह उन्होंने कर्म की महत्ता बताई है।
प्रदीप गुरु, पुजारी, महाकाल मंदिर उज्जैन
बुद्धि और मन के बीच का अंतर जिसने समझ लिया वह ज्ञानी हो जाता है। किंतु लोग मन के मारे हैं, वे इससे आगे की सोच ही नहीं पाते हैं। मन के वशीभूत होकर ही पापों का रास्ता चुनने को मजबूर हो जाते हैं। एकाग्रता के लिए ध्यान लगाने का समय नहीं है, जबकि मन उनको ऐसा करने से रोकता है। कलियुग के इस काल में सबसे अधिक लोग मन से ही व्यथित हैं, मन की क्षणिक प्रसन्नता के चक्कर में दीर्घकालिक खुशियों को देख ही नहीं पा रहे हैं। आवश्यकता है स्वयं को एकाग्र रखकर मन को बुद्धि प्राप्ति की ओर ले जाने की है। इसमें थोड़ी कठिनाई होगी, लेकिन अंत में विजय आपकी होगी।
रामानुज तिवारी, प्रमुख पुजारी, सिद्ध गणेश मंदिर, जबलपुर
काम को कार्य के रूप में लिया जाए या उपभोग के रूप में, दोनों ही दृष्टि में यह पाप के मार्ग को प्रशस्त करता है। आलेख में सच ही कहा गया है कि उपभोग इच्छा को बढ़ाता है।
सुरेश गिरि, संयोजक, जन चेतना मंच, सिंगरौली
आलेख में आवरण व उससे मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव की बहुत ही सारगर्भित व्याख्या की है। आवरण के आत्मा, बुद्धि पर पड़ने वाले प्रभाव व काम, मोह, मद कैसे पैदा हो जाता है, इसकी जानकारी दी है।
विकास दशोत्तर, ज्योतिषाचार्य, रतलाम
जब कोई इंसान कोई काम गलत नही करना चाहता, लेकिन अगर वो किसी की बातों में आ गया या किसी के बहकावे में आ गया, तो वह प्रभावित हो जाता है और वो काम कर देता है। काम का अर्थ यहां इच्छा से है। इच्छा कभी पूरी नहीं होती, हमेशा बढ़ती जाती है और इनको नियंत्रित तो किया जा सकता है, लेकिन रोका नहीं जा सकता।
डॉ अमिताभ पांडे, प्राचार्य, पीजी कॉलेज, छिंदवाड़ा
काम, वासना प्रत्येक व्यक्ति के अंदर है। काम वासना ही हमें पाप कर्मों की ओर धकेलती है। कामना पूर्ति के लिए ही लोग पाप कर्म की ओर अग्रसर होते हैं। कामना की उत्पत्ति मन से ही होती है। मन में विकार आना स्वाभाविक है। कोठारी ने अपने आलेख में मन को वश में करने का भी उपाय बताया है कि अभ्यास से मन को स्थिर किया जा सकता है। काम पर विजय मन और बुद्धि से ही प्राप्त हो सकती है। बुद्धि के द्वारा मन की चंचलता पर वश में किया जा सकता है, क्योंकि बुद्धि चंचल नहीं होती जबकि मन चंचल होता है।
पंडित रमाकांत बुधौलिया, ज्योतिषाचार्य, दतिया
कामना की पूर्ति को ही व्यक्ति अपने जीवन का आधार बना लेता है। काम पूरा न होने पर मन में क्रोध बढ़ता है और व्यक्ति इस कार्य को करने लगता है जो जीवन का आधार नहीं है। आलेख में काम की भावना से होने वाले प्रायोजकों को स्पष्ट किया है। मनुष्य की इंद्रियां उसे वासना की ओर ले जाती हैं, जिससे कामनापूर्वक किए कार्य भी पाप रूप हो जाते हैं।
मोहकम सिंह, भिण्ड
इंसान के जीवन का आधार कामना है और कामना की आस के साथ ही वह जीवन जीता है। हालांकि काम रूपी भाव उसे हमेशा घेरे रहता है। यही कारण है कि काम ही पाप का प्रायोजक भी है। इंसान के मन में काम रूपी पाप बुरे कार्य भी करा देते हैं। कर्मयोगी को कामों का त्याग करते हुए अपने कर्म करते रहना चाहिए।
नरेन्द्रनाथ पांडेय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर
कामना व उसके दुष्परिणाम को सटीक परिभाषित करते हुए मन को समाहित किए बिना विवेक जागृत नहीं होने के सिंद्धांत को लेख में बखूबी प्रतिपादित किया है। सही कहा है कि काम संकल्प बढ़ने से आत्म-दृष्टि घटती जाती है। मन पर आवरण बढ़ता जाता है। भीतर मौजूद परमात्मा का प्रकाश ढक जाता है। बिना काम के कोई क्रिया नहीं होती है। इसलिए कहा जाता है कि काम ही पापों का प्रायोजक है। केवल मोह और काम का त्याग करना ही श्रेष्टकर है।
कृष्णकांत मिश्रा, छतरपुर
Published on:
17 Oct 2023 02:28 pm
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