
वाक् को विस्तृत तौर पर परिभाषित कर इसे सृष्टि के रूप में निरूपित करते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला शरीर ही ब्रह्मांड के आलेख ' वाक् ही सृष्टि' को प्रबुद्ध पाठकों ने जीवन में आनंद और रस की भावपूर्ण व्याख्या बताया है। उनका कहना है कि लेख हर परिस्थिति में आनंद को ग्रहण करने का संदेश भी देता है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से
ये बात बिलकुल सही है कि जीवन का रस सुख में है। नीरस जीवन मृत्यु का पर्याय ही कहा जाएगा। वैसे इंसान को जीवन भर हर रस का बोध होते रहना चाहिए। मन सूक्ष्मतर है, इसलिए ऐसा बोध रखना चाहिए कि हर मन कर्म रसमय बना रहे। जीवात्मा का यात्रा मार्ग ही अन्न ही है।
नरेंद्रनाथ पांडेय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर
आलेख में जीवन में रस के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। कोठारी ने रस कर्म के माध्यम से उत्पन्न आनंद को प्रभु की भक्ति से जोड़ा है। अन्न व शब्द के माध्यम से शरीर के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका की व्याख्या की है।
रवि जैन, ज्योतिषाचार्य, रतलाम
यह लेख समाज को एक नई राह दिखाने वाला है। प्रत्येक व्यक्ति को इसे अपने जीवन में समाहित करना चाहिए l जिस व्यक्ति ने अपने मन पर काबू कर लिया उसके लिए कोई भी कठिनाई मुश्किल नहीं होती। शांत मन सकारात्मक विचार पैदा करता है और तरक्की का कारक बनता है। अनंत इच्छाओं और चेतनाओं से भरपूर मन अधिकतर विचलित रहता है। माना जाता है कि जैसे घर की सफाई होती है वैसे ही मन की सफाई भी करना चाहिए। ज्ञानियों का मानना है कि मन से ज्यादा कोई दूसरी उपजाऊ चीज होती भी नहीं है। जिसने इसका सदुपयोग किया वो जल्द सफलता प्राप्त करता है।
अजय शुक्ला, शिक्षक, बैतूल
जीवन के सुख में ही रस है। यह बात सही है जिसके जीवन में रस नही, उसका जीवन नीरस हो जाता है। आलेख में इस बारे में काफी अच्छे तरीके से बताया गया है।
नंदकिशोर राठी, व्यापारी, शिवपुरी
आज के लेख में कोठारी ने जीवन में आनंद और रस की व्याख्या सुख दुःख से की है। उन्होंने सही कहा है कि जो हर परिस्थिति में आनंद को ग्रहण करता है उसका जीवन रसमय है। मनुष्य के भीतर ही सृष्टि समाहित है।
संतोष लहारिया, शिक्षक, भिण्ड
आत्मा और जीव का संबंध जब तक रहता है, तब तक शरीर में प्राण रहते हैं। जैसे ही इनके संबंध टूटते हैं या कहा जाए कि आत्मा दूसरा शरीर खोजती है तो पहले शरीर का अंत हो जाता है। सृष्टि अनंत है, यहां असंख्य आत्माएं हैं। लेकिन शरीर को चलाने के लिए अन्न की आवश्यकता भी होती है। तभी आत्मा उसमें जीवित रहती है। अब अन्न भी दूषित होता जा रहा है जो शरीर को विषैला बना रहा है। ऐसे में शरीर आत्मा का साथ जल्दी छोड़ रहा है। अन्न का परिवर्तन मन को भी प्रभावित कर रहा है। इसलिए आवश्यक हो गया है कि अन्न को शुद्ध किया जाए, जिसका फायदा मन और शरीर दोनों को होगा।
पं. योगेन्द्र त्रिपाठी, भागवताचार्य, जबलपुर
वाक् ही सृष्टि के माध्यम से सांसारिक लोगों को बोध कराने के लिए जो लेख लिखा गया है, वह अतुलनीय है। सृष्टि के संचालन के लिए वाक् एवं नांद अति आवश्यक है। इसे काफी बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है। जो शब्द ब्रह्म है, ब्रह्मा स्वरूप है, इसलिए शब्दों के माध्यम से हम ब्रह्म को समझ सकते है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसे काफी बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
महंत अनिलानंद, भोपाल
कोठारी के लेख मैं हमेशा पढ़ता हूं। कोठारी गीता का उदाहरण दे कर सारी शंकाएं दूर कर देते हैं। आज का लेख 'वाक् ही सृष्टि' पढ़ कर मन में अद्भुत शांति का अनुभव हुआ। जीवन का सुख ‘रस’ में है। नीरस जीवन मृत्यु का पर्याय है। जीवन में आनंदित रहना जरूरी है। इसके लिए रस का होना चाहिए।
गोपी ठाकुर, मंडला
आलेखमाला शरीर ही ब्रह्मांड मैं प्रति शनिवार पढ़ती हूं। इसमें विज्ञान और अध्यात्म का संगम रहता है। इस बार के लेख में महिला और पुरुष शरीर की भी बेहतर व्याख्या की है।
सुनीता गवांडे, कवि, बुरहानपुर
लेख में सृष्टि के प्रमुख आधार में वाक्, और प्राण की महत्ता को दर्शाया गया है। जीवन में रस की भूमिका का शास्त्र व वैज्ञानिक आधार पर वर्णन अनेक जिज्ञासाओं को शांत करता है। रस हर प्राण को आनंदित करता है, जीवन में सुख की अनुभूति भी रस से ही होती है।
देवाशीष पाठक, देवास
Updated on:
14 Jul 2024 10:33 am
Published on:
13 Jul 2024 05:36 pm
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