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नेकी और पूछ-पूछ

हालत यह है कि ईमानदार परिश्रमी कर्मचारी परेशान है और बेईमानों के मौजां ही मौजां हो रही है। कोई पूछने वाला नहीं

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Shankar Sharma

Sep 18, 2015

Opinion news

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बेचारे। कितना काम करते
हैं। सुबह और शाम, काम ही काम। इतना थक जाते हैं कि सिर चकराने लगता है। हाथ-पांव
जवाब दे जाते हैं। लेकिन इसके बाद जैसे ही छुट्टी होती है तो दफ्तरों से ऎसे
तरोताजा निकलते हैं मानो किसी "स्पा" से आ रहे हों। सरकार भी इतनी अच्छी कि पूछो
मत। सारे काम कर्मचारियों से पूछ कर करती है- सुनो जी। कर्मचारी जी। पांच दिन की
बजाय दफ्तर छह दिन का कर दें क्या ?

सुनते ही कर्मचारी ऎसे मुंह फुला लेते हैं जैसे
पति द्वारा सहेली के घर जाने को मना करने पर पत्नी। काम सारे करती है पर बोलती नहीं
। बुरा न मानें, हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि क्या उस वक्त किसी डॉक्टर ने कहा
था जो छह दिन के कार्य सप्ताह को पांच दिन में बदल दिया और अब क्या पहाड़ टूटने
वाला है जो पुन: छह दिन करने की मिन्नतें हो रही हंै? पंडित नेहरू ने कहा था कि
आराम हराम है।

उनके इस नारे को एक वर्ग ने थोड़ी सी उलटफेर के साथ नया वाक्य बना
दिया "काम हराम" है। हो सकता है कि ऎसी बातें सुन कर कुछ सच्चे कामगार नाराज हो
जाएं लेकिन जरा आप हमारे संग कुछ सरकारी दफ्तरों में घूम आएं तो ऎसे-ऎसे नजारे
दिखेंगे कि आप दंग रह जाएंगे। आम तौर पर दफ्तरों में दो तरह के प्राणी पाए जाते
हैं- एक काम करने वाले और दूसरे बातूनी। जो काम करने वाला आदमी होता है अफसर उसे ही
काम पर काम दिए जाता है।

अगर कोई कहे कि साहब फलाने फोकटिए को भी कुछ काम दीजिए। तो
वह बुरा-सा मुंह बना कर चीखता है- अरे उसे रहने ही दो। काम कम करेगा नाक में दम
ज्यादा करेगा। मैं चाहूं तो उसको मजा चखा सकता हूं पर उसकी बीवी बच्चों का ध्यान
करके चुप रह जाता हूं। यानी अफसर भी अचानक दयावान बन कर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं।


जबकि हकीकत कुछ और होती है। क्या सरकार अब तक सारे निर्णय कर्मचारियों से पूछ कर ही
करती आई है। कई सज्जन तो अपनी कुर्सी पर कोट टांग कर दिन भर के लिए फुर्र हो जाते
हैं। कई लोग सरकारी कम्प्यूटर पर शेयर का धंधा करते हैं। एक भाई साहब तो नौकरी भी
करते थे और बैंड भी चलाते थे।

हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह बहानेबाज
कर्मचारियों के हजारों किस्से फिजा में तैर रहे हैं। किसी भी दफ्तर में जाकर इनकी
प्रेरक कथा सुन सकते हैं। हालात यह है कि ईमानदार परिश्रमी कर्मचारी प्राय: तनाव
में रहता है और बेईमानों के मौजां ही मौजां चल रही है। कोई पूछने वाला नहीं। एक
फन्ने खां ने अपनी सफलता का सस्वर वर्णन यूं किया- भाईजी! अपना तो उसूल ये है कि ना
किसी को करना नहीं। काम किसी का करना नहीं। जय हो ऎसे राज की।
राही