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पड़ोस में भारत-विरोधी ताकतों की बढ़त, परीक्षा की घड़ी

एकतरफा चुनाव के कारण शेख हसीना और आवामी लीग की साख पर गंभीर सवाल उठे, पर तख्तापलट की भूमिका लिखी गई आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन से, जिसमें बाद में तमाम विरोधी ताकतें भी शामिल हो गईं। पुलिस व सेना की कार्रवाई में हिंसा और भी भड़की। शेख हसीना आंदोलन को समझ ही नहीं पाईं।

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जयपुर

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Nitin Kumar

Aug 07, 2024

राज कुमार सिंह

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है
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भारतीय ज्योतिषी ने भविष्यवाणी तो की थी 5 अगस्त को इजरायल और ईरान के बीच टकराव से महायुद्ध के आगाज की, लेकिन तख्तापलट बांग्लादेश में हो गया। एक महीने से भी ज्यादा समय से बांग्लादेश में जारी आरक्षण विरोधी छात्र हिंसा ने ऐसा रूप लिया कि 5 अगस्त को एक नाटकीय घटनाक्रम में शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद ही नहीं, देश भी छोडऩा पड़ा। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे कर देश से पलायन करने वाली शेख हसीना और बांग्लादेश में हिंसा के निशाने पर आ गई उनकी आवामी लीग पार्टी की आगे क्या भूमिका होगी, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन 5 अगस्त के घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया में शांति और शक्ति संतुलन से जुड़े कुछ गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके दूरगामी परिणाम और प्रभाव होंगे। लगभग 20 साल बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहने वाली शेख हसीना ने इसी साल जिन चुनावों के जरिए 5वीं बार सत्ता संभाली थी, उन्हें स्वतंत्र एवं निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता। ज्यादातर विरोधियों को जेल में डाल दिया गया था और विपक्षी दलों ने चुनावों का बहिष्कार किया था, पर पाकिस्तान व बांग्लादेश में तो अक्सर ही ऐसा होता रहा है।

जिस तरह एकतरफा चुनाव हुए, उससे शेख हसीना और आवामी लीग की साख पर गंभीर सवाल उठे, पर तख्तापलट की भूमिका लिखी गई आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन से, जिसमें बाद में तमाम विरोधी ताकतें भी शामिल हो गईं। 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश के मुक्ति के संग्राम की अगुवा रही मुक्ति वाहिनी के सदस्यों के परिजनों के लिए 2024 में सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण पर शेख हसीना सरकार के विरुद्ध यह छात्र आंदोलन भड़का। आरक्षण 50 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया था, जिसका छात्र, घटती सरकारी नौकरियों और बढ़ती बेरोजगारी के मद्देनजर विरोध कर रहे थे। पुलिस और सेना की कार्रवाई में बड़ी संख्या में आंदोलनकारी मारे भी गए, जिससे हिंसा और भी भड़की। शेख हसीना इस छात्र आंदोलन को सही ढंग से समझ ही नहीं पाईं। कभी आंदोलनकारियों को गद्दार करार दिया तो कभी बातचीत का न्योता भेजा। जाहिर है, इससे विरोधी ताकतों को छात्र आंदोलन के राजनीतिक इस्तेमाल का मौका मिल गया। बेशक 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति के स्वतंत्रता सेनानी रहे लोगों के परिजनों को 53 साल बाद सरकारी नौकरियों में आरक्षण को तर्कसम्मत नहीं ठहराया जा सकता। शेख हसीना अपने वोट बैंक को मजबूत करने की ही कवायद कर रही थीं, जो अंतत: उन्हें इतनी भारी पड़ी कि सत्ता छोड़ कर विदेश में शरण की नौबत आ गई।

दरअसल, कोरोना काल से ही डगमगाई बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को आधार बना कर शेख हसीना विरोधी ताकतों, जो असल में भारत विरोधी ताकतें भी हैं, ने सत्ता विरोधी माहौल बनाना शुरू कर दिया था। बेलगाम महंगाई इसमें मददगार बनी। आम चुनाव के जरिए जब मंसूबे पूरे होते नहीं दिखे, तो मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान की आइएसआइ और चीनी षड्यंत्रकारियों से मिल कर तख्तापलट की साजिश रची, जिसे अंजाम देने का मौका खुद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण के अतार्किक दांव और विरोध में हुए छात्र आंदोलन से निपटने के गलत ढंग के जरिए उपलब्ध करवा दिया। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की पाकिस्तानपरस्त और भारत विरोधी छवि किसी से छिपी नहीं है। खबरें हैं कि उनके बेटे और पार्टी में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले तारिक रहमान ने पिछले दिनों अपने चीनी मित्रों और आइएसआइ के असरदार लोगों से विदेश में मुलाकातें की थीं। कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी भी पाकिस्तानपरस्त और भारत विरोधी है। दोनों ही शेख हसीना को भारत की कठपुतली बताते और बांग्लादेश में भारत विरोधी माहौल बनाते रहे हैं। यह तो ऐतिहासिक तथ्य है कि पाकिस्तान के दमन से पूर्वी पाकिस्तान को मुक्ति दिलवा कर बांग्लादेश को पृथक देश बनवाने में भारत की निर्णायक भूमिका रही, जिसका बदला लेने की हसरत हर पाकिस्तानी हुक्मरान और वहां की सेना का जनरल पाले रहता है। सच यह भी है कि दोनों देशों के बीच गहरे दोस्ताना और व्यापारिक रिश्ते भी हैं। आपसी विश्वास पर टिके ये रिश्ते दोनों ही देशों के लिए परस्पर लाभप्रद रहे हैं।

आंदोलनकारियों की घेराबंदी के बाद बांग्लादेश की सेना ने भी शेख हसीना को इस्तीफा दे कर देश छोडऩे की सलाह दी। हसीना के पलायन के कुछ ही घंटे बाद वैसे ही दृश्य नजर आए, जैसे कुछ समय पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन में नजर आए थे। सुखद संकेत है कि सेना ने खुद सत्ता पर काबिज होने के लोभ से बचते हुए अंतरिम सरकार के गठन का विकल्प चुना है, पर आंदोलनकारियों ने जिस तरह बांग्लादेश के राष्ट्रपिता माने जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमाएं तोड़ी हैं, वह आंदोलन के पीछे गहरी साजिश का जीता-जागता सबूत है। बंग बंधु के संबोधन से चर्चित मुजीब भारत को सच्चा मित्र मानते थे। पर अब माहौल बता रहा है कि जब भी चुनाव होंगे, चीन और पाकिस्तान की सरपरस्ती में भारत विरोधी ताकतों का पलड़ा भारी रहने की आशंका है। यह भारत के लिए कड़ी कूटनीतिक परीक्षा की घड़ी होगी।