
अल नीनो से बढ़ते तापमान के साथ खेती पर मंडराता खतरा
ज्ञानेंद्र रावत
वरिष्ठ पत्रकार एवं
लेखक
अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के चलते जहां तापमान में बढो़तरी का खतरा मंडरा रहा है, वहीं खेती पर बढ़ते संकट को भी नकारा नहीं जा सकता। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की मानें, तो बीते सात सालों में बन रही अल नीनो के चलते तापमान में वृद्धि के साथ मौसम में प्रतिकूलता के कारण खेती पर भी दुष्प्रभाव पड़ सकता है। इसके चलते खाद्य वस्तुओं के दामों में तेजी की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि इस वर्ष की दूसरी छमाही में अल नीनो की गतिविधि जारी रहने की 90 फीसदी आशंका है। डब्ल्यूएमओ के महासचिव प्रोफेसर पेट्टेरी तालास के अनुसार अल नीनो की वजह से दुनिया में तापमान के सारे रेकार्ड टूटने की आशंका है। खास बात यह है कि यह प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाला जलवायु पैटर्न है, जो मध्य और पूर्वीय उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के बढऩे से जुड़ा है। गौरतलब यह है कि तीन जुलाई को दुनिया भर में औसत तापमान 17.01 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया जिसने अगस्त 2016 में बनाए गए 16.92 डिग्री सेल्सियस के रेकार्ड को तोड़ दिया। तीन जुलाई को अमरीका में टैक्सास और दक्षिणी क्षेत्र के निवासियों को रेकार्ड गर्मी और चीन के लोगों को तेज लू का सामना करना पड़ा। यहां तक कि अंटार्कटिका में भी तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहां जुलाई में तापमान 8.7 डिग्री दर्ज किया गया।
दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने काफी पहले से ही यह चेतावनी दे दी थी कि साल 2023 में अल नीनो अपना असर दिखाएगा। इस बार तीन महीने का इंडेक्स बता रहा है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो के सक्रिय रहने का खतरा 98 फीसदी तक बढ़ गया है। इंडेक्स के अनुसार औसत तापमान बहुत ऊपर जा चुका है। डब्ल्यूएमओ प्रशांत महासागर की सतह के गहन अध्ययन के बाद भारत समेत दुनिया के देशों को पहले ही सतर्क कर चुका है। मौसम विज्ञानी भी चेता चुके हैं कि अल नीनो के प्रभाव के कारण खरीफ की फसलें भी प्रभावित होंगी। यह बात दीगर है कि पूरी तरह सूखे की स्थिति नहीं रहेगी, क्योंकि बीच-बीच में कभी-कभी वर्षा भी होती रहेगी। आइएमडी ने सामान्य वर्षा का तो अनुमान व्यक्त किया था, लेकिन अल नीनो के खतरे से कभी इनकार भी नहीं किया था। सच्चाई तो यह भी है कि अल नीनो के असर को भारत पहले भी झेल चुका है। 2015 में भी भारत ने मानसूनी बारिश में 15 फीसदी की कमी का सामना किया था। यहां तक कि गंगा के मैदानी इलाकों में 25 फीसदी तक कम बारिश हुई थी। देश के कुछ राज्यों को तो खरीफ की फसल में भारी नुकसान उठाना पड़ा था। कहा गया था कि इस बार भी पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, झारखंड सहित कुछ राज्यों को वर्षा की औसत मात्रा में कमी का सामना करना पड़ेगा, जबकि पहला पखवाडा़ वर्षा से भरपूर रहेगी। इसके बाद खेतों में बुआई हो चुकी होगी। अगर बीच में थोड़ी बहुत वर्षा होती भी रहेगी तो उससे ज्यादा कोई दुष्प्रभाव पडऩे वाला नहीं है। लेकिन देश के पठारी और ऊपरी इलाके पानी की कमी से जूझते रहेंगे।
इस वक्त टमाटर के दाम आसमान छू रहे हैं, दाल,चावल, गेहूं के दामों को नियंत्रित करने के लिए सरकार को काफी माथापच्ची करनी पड़ रही है। इसके पीछे जो अहम कारण हैं, उनमें भू-राजनीतिक तनाव में बढ़ोतरी, ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में अस्थिरता, अल नीनो का असर भी है। कीमतों में आगे भी बढ़ोतरी हो सकती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी से भी कीमतें भी बढ़ी हैं। खतरा यह है कि यदि उत्पादन में गिरावट आई तो महंगाई और भी बढ़ जाएगी। सरकार को अल नीनो से पैदा होने वाले खतरे को ध्यान में रखते हुए खाद्य पदार्थों के मूल्यों को नियंत्रित करने के उपाय करने चाहिए।
Published on:
18 Jul 2023 09:30 pm
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