
salman khan
न्याय की चौखट पर देर हो सकती है लेकिन अंधेर नहीं। गुनहगार कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे अपने किए की सजा भुगतनी ही पड़ती है। जाने-माने अभिनेता सलमान खान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बीस साल पुराने हिरण शिकार मामले में सलमान को आखिर पांच साल की सजा हो ही गई। मामले के अन्य आरोपियों- सैफ अली खान , तब्बू, सोनाली बेंद्रे और नीलम को अदालत ने बरी कर दिया। इन सभी पर जोधपुर के समीप काकाणी गांव में दो काले हिरणों के शिकार का आरोप था।
शिकार मामले से जुड़े अन्य मामलों में सलमान को पहले भी सजा हो चुकी है, लेकिन ऊपरी अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। दो दशक देर से ही सही लेकिन सलमान को अपने गुनाह की सजा आखिर मिल ही गई। सलमान को मिली सजा से एक बात और साफ हो गई है। वो ये कि न्याय के दरवाजे पर सभी एक समान हैं। सलमान को जिस मामले में सजा हुई है वह हिरण के शिकार का है।
विश्नोई समाज वन्यजीवों को परिवार से भी अधिक मानता है। इस मामले में विश्नोई समाज की सजगता के चलते मामला यहां तक पहुंच पाया। अनेक गवाहों ने बयान बदल लिए लेकिन विश्नोई समाज दोषियों को सजा दिलाने को अडिग रहा। आज के दौर में हत्या के अपराधी भी बच निकलते हैं। ऐसे में दो हिरणों की हत्या के मामले में सलमान को सजा मिलना अचंभित जरूर करता है।
इसे हमारी न्याय व्यवस्था की खामियों में ही शुमार किया जाएगा कि निचली अदालत से फैसला आने में बीस साल लग जाते हैं। एक अदालत के फैसले में अगर बीस साल लग गए तो ऊपरी अदालतों के चक्कर में अभी १०-१५ साल का समय और लग सकता है।
ऐसी स्थिति न्याय मिलते हुए दिखने की तो नहीं मानी जा सकती है। अदालतों की कानूनी पेचीदगियों को सरल बनाने की लम्बी-चौड़ी चर्चाओं के बावजूद रास्ता निकलता नजर नहीं आ रहा है। सरकार, और न्यायविदों को इस दिशा में सक्रिय प्रयास करते रहना चाहिए ताकि कोई राह सूझ सके। जब तक कोई रास्ता नहीं निकलेगा, नैसर्गिक न्याय की अवधारणा किताबी ही रहेगी।
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