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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – चक्रव्यूह में दीदी

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में सबसे गर्म वातावरण पश्चिम बंगाल में है। पश्चिम बंगाल में हर दिशा में दो प्रश्न तैर रहे हैं। पहला-क्या ममता बनर्जी लगातार चार बार मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड बना पाएंगी? दूसरा-क्या भाजपा बंगाल में ममता बनर्जी के गढ़ को तोड़ सत्ता के सिंहासन पर पहुंच पाएगी?

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Apr 19, 2026

West Bengal Assembly Elections Gulab Kothari opinion didi Mamata Banerjee in Chakravyuh

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो पत्रिका

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में सबसे गर्म वातावरण पश्चिम बंगाल में है। तृणमूल कांग्रेस की प्रतिष्ठा तो भारतीय जनता पार्टी की आकांक्षा दांव पर है। हर दिशा में दो प्रश्न तैर रहे हैं। पहला-क्या ममता बनर्जी लगातार चार बार मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड बना पाएंगी? दूसरा-क्या भाजपा बंगाल में ममता बनर्जी के गढ़ को तोड़ सत्ता के सिंहासन पर पहुंच पाएगी? चाहे किसी भी पार्टी के प्रत्याशी से बात करो या आम मतदाता से, एक बात सब स्पष्ट कर रहे हैं कि दीदी के लिए इस बार जीत उतनी आसान नहीं होगी।

इस बार पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिस तरह रणनीतियां बनाई जा रही हैं, उससे लगता है कि पहली बार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस चक्रव्यूह में फंसती जा रही है। जिन रणनीतियों के बल पर वे पिछले तीन विधानसभा चुनाव में जीतीं, इस बार उन सबकी काट बंगाल के रण में दिखाई दे रही है। तृणमूल कांग्रेस का मूलमंत्र रहा है मुस्लिम और महिला। इस बार एसआइआर का ऐसा चक्र चला कि 90 लाख से ज्यादा मतदाता बाहर हो गए। इसमें कुछ असली थे, कुछ फर्जी थे और कुछ घुसपैठिए भी। प्रदेश की उद्योगमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की बड़ी नेता शशि पांजा से मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने स्वीकार किया कि एसआइआर के मुद्दे ने हमें (तृणमूल कांग्रेस को) इतना परेशान कर रखा है कि चुनाव अभियान में हम जनता को अपनी उपलब्धियां ही नहीं बता पा रहे। सारा ध्यान मतदाता सूचियों संबंधी शिकायतें सुनने में ही लग जाता है। ‘घुसपैठियों’ का नेरेटिव इस तरह चल गया है कि हमारा आधा समय इसे स्पष्ट करने में लग जाता है कि हमारे वोटर घुसपैठिया नहीं है। हिन्दू वोटरों के नाम भी कटे हैं।

तृणमूल पार्टी की चिंता का दूसरा कारण पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस और वामपंथी दलों का ज्यादा सक्रिय हो जाना है। इन दोनों को पिछले चुनाव में सीटें तो शून्य मिली थी पर दोनों वोट प्रतिशत का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा ले गए थे। इस बार यह हिस्सा बढ़ गया तो सेंध तो दीदी के वोट बैंक में ही लगेगी। महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने विधायिका में महिला आरक्षण को 2029 के आम चुनाव से ही लागू कराने के लिए संविधान संशोधन विधेयक का पासा फेंका। हालांकि विधेयक पारित नहीं हो सका लेकिन महिला मतदाताओं के सामने यह बात तो चली ही गई कि जिन पार्टियों ने विधेयक को गिराया, उनमें तृणमूल कांग्रेस भी शामिल थी।

पश्चिम बंगाल की जनता का इतिहास रहा है कि वह किसी एक विचारधारा से दीर्घकाल तक नहीं बंधी रही है। स्वतंत्रता के बाद 1977 तक लगातार कांग्रेस को मौका दिया। फिर वाममोर्चा ने सत्ता संभाली तो उसे भी 34 साल तक निभाया। पिछले 14 वर्ष से तृणमूल कांग्रेस शासन कर रही है। यह भी इतिहास रहा है कि एक पार्टी के शासन काल के बीच ही दूसरी पार्टी सक्रिय हो जाती है और धीरे-धीरे सत्ता हासिल कर लेती है। भाजपा ने 2016 के विधानसभा चुनाव में 10.16 प्रतिशत वोट हासिल किए और 3 सीटें जीतीं। 2021 के चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढक़र 38 प्रतिशत और सीटें 77 हो गईं।

एक विचारधारा से दीर्घकाल तक नहीं बंधी जनता

इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 48 प्रतिशत वोट मिले थे। इस बार 5 प्रतिशत वोट भी इधर-उधर हो जाएं तो बाजी पलट सकती है। यही कारण है कि इस बार चुनावी सभाओं में ममता बेहद आक्रामक दिखाई दे रही हैं। वे ‘एसआइआर’ पर तीखे आक्रमण कर रही हैं।

दूसरी ओर, भाजपा धीमी गति से लेकिन असरदार रणनीतियों के साथ आगे बढ़ रही है। अमित शाह चुनाव के अन्तिम सात दिनों में पश्चिम बंगाल में ही ठहरने का इरादा व्यक्त कर चुके हैं। उनके विशेष रणनीतिकार भूपेन्द्र यादव पिछले छह माह से पश्चिम बंगाल में प्रभार संभाले हुए हैं। मेरे साथ लम्बी चर्चा में उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल की जनता भ्रष्टाचार और हिंसा से परेशान हो चुकी है। आतंक इतना है कि खुलकर वोट देना तो दूर भाजपा के समर्थन में विचार व्यक्त करने वाले भी निशाने पर आ जाते हैं। इसीलिए चुनाव आयोग ने इस बार सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की है ताकि मतदाता निर्भय होकर वोट दे सकें। मेरी यात्रा के दौरान ही भवानीपुर में दो बार ऐसी घटना हुई जब भाजपा के झंडे-बैनर फाड़ दिए गए। पहली बार भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। क्योंकि सुरक्षा की निगरानी के लिए पर्याप्त संख्या में अर्द्धसैनिक बल हर जगह तैनात हैं। पिछली बार आठ चरणों में चुनाव कराए गए थे। इस बार दो ही चरणों में हैं-23 व 29 अप्रेल को। सुरक्षा बल अधिक फोकस होकर काम कर सकेंगे।

तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए प्रभावशाली विधायक हुमायूं कबीर इस बार अपनी आम जनता उन्नायक पार्टी के साथ अलग ताल ठोक रहे हैं। उनका और ममता बनर्जी का वोट बैंक एक ही हैं। सीट भले ही ज्यादा नहीं जीत पाएं, पर कुछ सीटों पर नुकसान तो पहुंचा ही देंगे। अल्पसंख्यक वोट बैंक में एसआइआर, कांग्रेस, माकपा और हुमायुं कबीर के कारण आई अस्थिरता को देखते हुए ममता दो जगह से चुनाव लड़ रही हैं। भवानीपुर और नंदीग्राम। भवानीपुर में उनका मुकाबला प्रदेश के दिग्गज भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी से है। शुभेन्दु अधिकारी को भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा भी माना जा रहा है। कांग्रेस चुनाव तो सभी सीटों पर लड़ रही है, पर उसे स्वयं भी 8-10 से ज्यादा सीटों से ज्यादा पर अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं है। तीन बार सांसद रहे कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता प्रदीप भट्टाचार्य तो यहां तक मानते हैं कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस में अन्दर ही अन्दर ‘सेटिंग’ है कि यहां हम एक-दूसरे को गाली देंगे पर दिल्ली में साथ रहेंगे। कांग्रेस को मुर्शिदाबाद, मालदा जैसे अल्पसख्यंक बहुल जिलों से उम्मीद है। कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्जी का वैमनस्य भी सार्वजनिक है।

मथुआ समुदाय भी चुनावी राजनीति का एक बड़ा मुद्दा है। हिन्दू होने के बाद भी इस समुदाय के बांग्लादेश से आए लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं मिलने को तृणमूल कांग्रेस ने मुद्दा बनाया हुआ है। वे भाजपा पर इस समुदाय को धोखा देने का आरोप लगाती है। दूसरी ओर, भाजपा इस समुदाय के दो गुटों को एक मंच पर लाने में लगी है। भाजपा ने विभिन्न सीटों पर प्रभाव डालने वाले अलग-अलग समुदायों को भी अपने पाले में लाने की रणनीति पर गहराई से कार्य किया है।
प​श्चिम बंगाल में 40 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिन्हें राजवंशी समाज प्रभावित करता है। इसी तरह 10 सीटों पर गोरखा, 20 सीटों पर मथुआ, 40 सीटों पर महतो और 15 सीटों पर सान्याल समुदाय चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। इन समाजों के भीतर भी अलग-अलग गुट हैं। भाजपा उन सभी गुटों को एक मंच पर लाकर अपने साथ जोड़ने में लगी है। भाजपा तृणमूल कांग्रेस के विरोध में एक आरोप पत्र जारी कर चुकी है। अब अपने घोषणा पत्र में सातवां वेतन आयोग, 61 रेल परियोजनाएं, महिलाओं को 3 हजार रुपए, युवाओं के लिए विभिन्न संस्थाएं जैसे वादे कर कर्मचारी, महिलाओं और युवाओं को आकर्षित करने का प्रयास किया है।

भाजपा के चक्रव्यूह में घिरने के बावजूद दीदी के तेवर कहीं हल्के दिखाई नहीं दे रहे। वे अकेले दम पर पूरी तृणमूल पार्टी का अभियान संभाले हुए हैं। भाजपा के कई कद्दावर नेता, केन्द्रीय नेता और मुख्यमंत्री यहां चुनावी सभाएं और जनसम्पर्क कर रहे हैं। यदि ममता इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल नहीं हुई तो कोई आश्चर्य नहीं भाजपा इस बार बड़ी सफलता हासिल कर ले।
gulabkothari@epatrika.com