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शरीर ही ब्रह्माण्ड : ब्रह्म की यात्रा : सूक्ष्म से स्थूल तक

Brahma ki Yatra : पंचाग्नि विद्या का अर्थ है- पांच अग्नियों से संबंधित विद्या। यह प्रजनन यज्ञ है, जो स्थान भेद से पांच संस्थाओं में विभक्त हो रहा है। ब्रह्म का विवर्त बन रहा है। एक ही ब्रह्म सूक्ष्मतम स्तर से पांच अग्नियों में आहूत होकर स्थूल देह धारण कर रहा है।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Apr 18, 2026

Brahma ki Yatra sukshm se sthul tak writen by Gulab Kothari Rajasthan Patrika

फोटो पत्रिका

Brahma ki Yatra : पंचाग्नि विद्या का अर्थ है- पांच अग्नियों से संबंधित विद्या। यह प्रजनन यज्ञ है, जो स्थान भेद से पांच संस्थाओं में विभक्त हो रहा है। ब्रह्म का विवर्त बन रहा है। एक ही ब्रह्म सूक्ष्मतम स्तर से पांच अग्नियों में आहूत होकर स्थूल देह धारण कर रहा है। पंचपर्वा विश्व में स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी ही सप्तलोकों की संस्था में विभक्त हो जाते हैं-सत्यम्, तप:, जन:, मह: स्व:, भुव: तथा भू। स्वयंभू के तपन और स्वेदन से उत्पन्न आप: लोक में भृगु, अंगिरा व अत्रि प्राणों के योग से अव्यय पुरुष की योनि मह:लोक बनता है-मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिनन्गर्भ दधाम्यहम् (गीता)। सूर्य अक्षर संस्था है तथा पृथ्वी और चन्द्रमा क्षर संस्था हैं।

सृष्टि को आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक तीन स्तरों पर विभाजित किया जा सकता है। इनमें सूर्य संस्था आधिदैविक, पार्थिव संस्था आधिभौतिक तथा पुरुष संस्था आध्यात्मिक है। सृष्टि का प्रत्येक यज्ञ पांच अवयवों वाला है, अत: प्रजनन यज्ञ भी पंचाग्नियों वाला सिद्ध होता है। जिस यज्ञ के दाम्पत्य भाव से अन्य दाम्पत्य यज्ञ (प्रजा) उत्पन्न होता है, वह प्राण और प्राणी यज्ञ के भेद से दो प्रकार का माना जाता है। इस दृष्टि से सौरसंस्था और आध्यात्मिक संस्था के यज्ञ दो-दो प्रकार के हो जाते हैं तथा आधिभौतिक यज्ञों अर्थात् पाषाण-मिट्टी आदि के यज्ञों से अन्य यज्ञ उत्पन्न नहीं होने से उसको केवल एक ही प्रकार का कहा जाता है। सूर्य, पृथ्वी और अध्यात्म तीन संस्थाओं के ये यज्ञ ही पंचाग्नि विद्या के रूप में जाने जाते हैं।

प्राण यज्ञ के तीन पर्व हैं- सूर्य, अन्तरिक्ष और पृथ्वी। वहीं प्राणी यज्ञ (प्राकृतिक प्राणियों से सम्बद्ध, जिसमें अन्त:संज्ञ तथा ससंज्ञ जीव आते हैं) के दो पर्व योषा एवं वृषा हैं। द्युलोक के अधिष्ठाता सूर्य के आग्नेय प्राणों से पुरुष (वृषा) की उत्पत्ति होती है तथा चन्द्रमा जो कि भूलोक (पृथ्वी) का अधिष्ठाता है, उसके सौम्य प्राणों से स्त्री (योषा) सृष्टि का आविर्भाव हुआ है। आधिदैविक संस्था में जैसे द्युलोक रूपी पिता एवं पृथ्वी रूपी माता से प्राणी यज्ञ सम्पन्न होता है वैसे ही आध्यात्मिक संस्था में पुरुष (पिता) एवं योषा (माता) के दाम्पत्यभाव से प्राणी यज्ञ (संतति निर्माण) सम्पन्न होता है।

पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा द्युलोक तीनों ही इस प्राण यज्ञ में पृथक्-पृथक् रहते हैं, जबकि वृषा-योषा के प्राण यज्ञ में अन्तरिक्ष संस्था योषा के गर्भरूप में ही अन्तर्भूत रहती है। अत: वृषा, योषा, पृथ्वी, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक इन पांच स्थलों पर सृष्टि यज्ञ होता है, यही पंचाग्नि का रहस्य है। प्रत्येक स्तर पर पंचाग्नि के हेतुभूत अवयव सात होते हैं- अग्नि, समित् (समिधा), धूम, अर्चि, अंगार, स्फुल्लिंग और आहूत होने वाला तत्त्व। अष्टम अवस्था में फल की प्राप्ति होती है। पृथ्वी का निर्माण भी आठ अवस्थाओं में होता है, तो शरीर की धातुओं का निर्माण भी आठ अवस्थाओं में होता हैं। पंचाग्नि का प्रधान फल ब्रह्मा का विस्तार है। यह स्थूलतम रूप में पार्थिव संस्था पर पूर्ण होता है। पार्थिव संस्था गायत्री छन्द से निर्मित है एवं गायत्री के आठ अवयव हैं अत: पंचाग्नि यज्ञ भी प्रत्येक स्तर पर अष्टावयवा ही होता है। पंचाग्नि के पांच स्तर हैं। प्रत्येक स्तर पर निर्माणात्मक अवयव भिन्न-भिन्न होते हैं। अत: इन अवयवों की भिन्नता के कारण प्रत्येक स्तर की सृष्टि में वैविध्य उत्पन्न हो जाता है। इन स्तरों को पांच विधाओं में समझा जा सकता है- द्युविधा, आन्तरिक्ष्य विधा, पार्थिव विधा, पुरुष विधा और योषा विधा।

द्युलोक अर्थात् सूर्य से संबंधित विधा द्युविधा है। इस लोक की अग्नि सौरप्राणाग्नि या सावित्र्याग्नि कहा जाता है। यह अग्नि दो स्वरूपों में परिणत होकर भूपिण्ड से सम्बन्ध रखता है। सूर्य से आता हुआ तेज इन्द्रप्रधान है तथा भूपिण्ड से टकराकर प्रतिफलित (पुनरावर्तित) होता हुआ सौर तेज अग्नि प्रधान है। इस यज्ञ में सावित्र्याग्नि 'अग्नि’ है। 'आदित्य’ समिधा है। रश्मियां धूम, 'अह:काल’ अर्चि, 'चन्द्रमा’ अंगार, 'नक्षत्र’ स्फुल्लिंग, 'श्रद्धा’ आहूत द्रव्य तथा 'सोम’ इस यज्ञ का फल है।

सूर्य और पृथ्वी के मध्य स्थान से संबंधित विधा को आन्तरिक्ष्य कहा जाता है। परमेष्ठी सोम ही सूर्य से नीचे अन्तरिक्ष में व्याप्त रहता है। तृतीयस्यां इतो दिवि सोम आसीत्… रूप में सोम को दिव्य लोक से सम्बद्ध होने के कारण दिव्य कहा जाता है। यह सोम घन-तरल और विरल भेद से क्रमश: वृत्र, पर्जन्य और सोम तीन प्रकार का है। इनमें आप्य प्राणों से युक्त (जलीय परमाणुओं) वायु ही पर्जन्य है। यह पर्जन्य द्युलोक से आते हुए सोम को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित कर लेता है, अत: यह आप्याग्नि (अग्नि) कहलाता है-पर्जन्यो वा अग्नि: (शत. 14.9.1.13)। पर्जन्य ही वृष्टि द्वारा समस्त संसार का उत्पत्ति कारक है-पर्जन्याद्धीदं सर्वं भवति।

इस यज्ञ में पर्जन्याग्नि अग्नि है। आप्य-प्राण-युक्त पर्यन्जवायु ही समित् है। विद्युत् अर्चि है। अभ्र धूम है। वज्र अंगार है, गर्जन-तर्जन विस्फुलिंग हैं। पर्जन्याग्नि में अन्तरिक्ष के वायु देवताओं द्वारा सोम की आहुति होती है। दोनों के सम्मिश्रण से वृष्टि होती है। यही इस यज्ञ का फल है।

पार्थिव विधा पृथ्वी लोक से संबंधित है। पिण्डात्मिका पृथ्वी भूमि कहलाती है तथा प्राणात्मिका पृथ्वी पृथ्वी कही जाती है। संसार की प्रत्येक वस्तु के निर्मापक तत्त्व ऋक् (केन्द्र) यजु: (प्राणात्मक तत्त्व) तथा साम (परिधि) होते हैं। केन्द्र से भूपृष्ठ तक व्याप्त अग्नि जब पृष्ठ से परिधि की ओर जाता है, तब उसकी घन-तरल और विरल तीन अवस्थाएं हो जाती हैं। घन अग्नि का (वसु) क्षेत्र त्रिवृत स्तोम (9वां), तरल अग्नि (रुद्र) का क्षेत्र पंचदशस्तोम (15) तथा विरल अग्नि (आदित्य) का क्षेत्र एकविंशस्तोम (21) कहा जाता है। पृथ्वी का साम 22वें अहर्गण तक जाता है। यह निधन साम कहलाता है। अत: यहां तक अमृताग्नि विस्तृत रहता है। मत्र्याग्नि तो 17वें अहर्गण तक व्याप्त रहता है। यही अग्नि भौतिक यज्ञ की योनि है- अग्निवैयोनिर्यज्ञस्य। इस यज्ञ में पार्थिवाग्नि अग्नि है। संवत्सर समित् है, आकाश धूम है। रात्रि अर्चि है। दिशाएं अंगारे हैं, उप दिशाएं विस्फुलिंग है। पार्थिव अग्नि में पार्थिव आग्नेय देवताओं द्वारा वृष्टि की आहुति होती है। पार्थिव प्राणाग्नि (मृण्मय भूताग्नि युक्त) तथा आन्तरिक्ष्य जल के योग से अन्न का उत्पन्न होना ही इस आधिभौतिक यज्ञ का फल है।

पुरुष विधा पुरुष है-षडंग वैश्वानर अग्नि। विराट्-हिरगण्यगर्भ-सर्वज्ञ तथा इनके प्रवग्र्य वैश्वानर-तैजस तथा प्राज्ञ का समूह षडंग वैश्वानर कहा जाता है। यही समस्त प्राणियों में अंतर्भूत रहता है। कृष्ण स्वयं वैश्वानरस्वरूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान रहते हैं- ''अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणीनां देहमाश्रित।'' इस यज्ञ में पुरुष शरीरस्थ वैश्वानराग्नि अग्नि है। पांचभौतिक शरीर वाक् है जो समिधा है। प्राण धूम हैं। जिह्वा अर्चि है। चक्षु अंगार हैं, श्रोत्र विस्फुल्लिंग है। इस आध्यात्मिक पुरुषाग्नि में आध्यात्मिक इन्द्रिय देवताओं द्वारा वर्षा से उत्पन्न अन्न रूप हवि द्रव्य की आहुति दी जाती है। इससे अन्न सप्त धातुओं—रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा के रूप में परिणत होते हुए शुक्र (रेत) बनता है। रेत अथवा शुक्र ही इस यज्ञ का फल है। यही आध्यात्मिक यज्ञ का प्रथम पर्व है।

आध्यात्मिक संस्था का दूसरा पर्व है योषा विधा। स्त्री के शोणित में प्रतिष्ठित अग्नि तत्त्व ही योषा यज्ञ की मूल प्रतिष्ठा है। उसका उपस्थ ही समिधा है, उप मंत्रणा की जाती है अर्थात् हाव भाव चेष्टा आदि धूम है। योनि अर्चि है, लिंग ही अंगारा है, आनन्द विस्फुलिंग है। पुरुष शरीरस्थ प्राण देवताओं द्वारा इस योषाग्नि में रेत (सोम) की आहुति होती है। रेत ही गर्भ में परिणत हो जाता है। संतति इस यज्ञ का फल है।
इस प्रकार पंचाग्नियों अर्थात् आदित्याग्नि, पर्जन्याग्नि, पार्थिव अग्नि, वैश्वानराग्नि तथा योषाग्नि में क्रमश: श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न व रेत की आहुति होती है। जिससे क्रमश: सोम, वृष्टि, अन्न, रेत व संतति रूप फलों की प्राप्ति होती है। यही ब्रह्म की सूक्ष्म से स्थूल तक की यात्रा का क्रम है।
क्रमश:
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