
सदैव ज्ञान-विज्ञान की पोषक रही है देववाणी संस्कृत
दयानन्द भार्गव
राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त संस्कृतज्ञ एवं वेद विज्ञानवेत्ता
संस्कृत-दिवस का सम्बन्ध केवल एक भाषा से ही नहीं है, एक संस्कृति से भी है। संस्कृत से जुड़ी संस्कृति प्राचीनतम तो है ही, वैश्विक भी है। वेद कहता है कि यह संस्कृति प्रथम वैश्विक संस्कृति है-सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा। विश्व का प्रथम दस्तावेज जो हमें उपलब्ध है वह ऋग्वेद है। उस वेद में अग्नि, वायु और आदित्य की स्तुति है। ये किसी एक प्रदेश के तो हैं नहीं, अपितु पूरे विश्व के हैं। अत: इस संस्कृति को सार्वभौम कह सकते हैं। शोधों से इस संस्कृति के सार्वभौमिक होने के प्रमाण भी मिलते जा रहे हैं। अमरीका के मूल निवासी सूर्य के उपासक थे, मध्य एशिया के दो राजाओं के बीच की गई सन्धि लेख में वैदिक देवताओं को साक्षी बनाया गया, ईरान के मूल धर्म मानने वाले पारसियों का अग्नि-पूजक होना सर्वविदित है। प्रमाण और भी हैं।
संस्कृत-संस्कृति वैश्विक दृष्टि प्रदान करती है, इसमें सन्देह नहीं। वेदान्त का घोष है कि यह सब कुछ ब्रह्म है-सर्वं खल्विदं ब्रह्म, यहां नानात्व कहीं भी नहीं है-नेह नानास्ति किंचन। यह सार्वभौमिकता की अद्वैतपरक व्याख्या है। लोकसभा ने इसे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की व्यावहारिक भाषा में अपनाया। भारत में संस्कृत की बात करें तो लैंडलाइन फोन के समय की किसी भी प्रदेश की डायरेक्टरी में अंकित नामों की सूची देख लें। उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक की टेलीफोन डायरेक्टरी में अंकित नामों में मानों संस्कृत भाषा का पूरा शब्दकोश ही समाया हुआ मिल जाएगा। खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा और भाषा की विविधता के बावजूद अपने नामों का आधार संस्कृत के शब्दों को रखना सभी भारतीयों की संस्कृत के प्रति आत्मीयता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। इसी बात को ध्यान में रखकर हमारे संविधान में हिन्दी को समृद्ध बनाने के लिए सभी भारतीय भाषाओं से सहायता लेने के साथ-साथ संस्कृत से विशेष रूप से शब्द-सम्पदा ग्रहण करने पर बल दिया गया है।
दण्डी ने संस्कृत को दैवी वाणी कहा है-संस्कृतं नाम दैवीवाक्। संस्कृत में दिव्यता क्या है? दिव्यता का अर्थ है-अलौकिकता, जो तर्क से परे है, जो मन से परे है। तर्क से परे प्रेम है, श्रद्धा है, स्नेह है। बराबर वालों से प्रेम, बड़ों के प्रति श्रद्धा और छोटों के प्रति स्नेह। इन तीनों में तर्क काम नहीं देता, अपितु जैसे-जैसे तर्क किया जाता है, वैसे-वैसे ये तीनों कम हो जाते हैं। इन तीनों में एक तरलता है, तर्क में शुष्कता है। ये तीनों जोड़ते हैं, संश्लेषण करते हैं, तर्क तोड़कर विश्लेषण करता है। तर्क के विश्लेषण का भी उपयोग है। तर्क का आधार कारण-कार्य-सम्बन्ध है। इस कारण-कार्य-कर्म-सिद्धान्त को जन्म देता है। तर्क की दिशा में कार्य हुआ तो कर्म-सिद्धान्त और उससे जुड़ा पुनर्जन्म सिद्धान्त उत्पन्न हुआ। विज्ञान की दिशा में गणित, धातु विज्ञान और आयुर्वेद जैसे शास्त्रों का जन्म हुआ। इन सब शास्त्रों का निर्माण संस्कृत में ही हुआ। किन्तु परम्परा केवल विज्ञान से सन्तुष्ट नहीं हुई। गीता ने कहा-ज्ञानविज्ञानसहितम्। केवल विज्ञान पर्याप्त नहीं। विज्ञान गति देता है तो ज्ञान दिशा देता है। ज्ञान के बिना विज्ञान दिशाहीन है। ज्ञान का अर्थ है कि हम सब मूलत: एक हैं-एकत्वमनुपश्यत:। इसलिए एक के हित में सबका और सबके हित में एक का हित निहित है। इस ज्ञान के साथ विज्ञान चले तो ही विज्ञान न केवल मनुष्य-मात्र का अपितु प्राणिमात्र का कल्याण कर सकता है और पर्यावरण भी सुरक्षित रह सकता हैै। इस प्रकार संस्कृत वैश्विक तथा समग्र-दृष्टि प्रदान करती है-इस विषय में शायद ही किसी को संदेह हो। इस पर भी जो संस्कृत-संस्कृति में दोष ढूंढना चाहें तो उन्हें दोष मिल जाएंगे। संस्कृत में कहा गया है कि ऊंट जंगल में फलदार वृक्षों को नहीं अपितु कांटेदार वृक्षों को ही ढंूढता है-क्रमेलक: कण्टकजालमेव। किन्तु राष्ट्रकवि कालिदास ने एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी है-सब कुछ प्राचीन ही अच्छा नहीं होता, न सब नवीन ही बुरा होता है। पुराणमित्येव न साधु सर्वम् न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ऐसे में हम नवीन का स्वागत करें किन्तु प्राचीन के मूल्यवान् अंश को खो न दें। स्कूली बच्चों के बस्ते के बोझ की चर्चा की जाती है।
इस सम्बन्ध में अपने ६० वर्ष के अध्यापकीय अनुभव के आधार पर एक बात कहना चाहता हूं। जिस संस्कृत-संस्कृति की चर्चा की गई है वह बस्ते को भारी नहीं बनाती अपितु जीवन को निर्भार करती है। आज की शिक्षा बहुत विस्तृत भी है और आवश्यक भी है। इस शिक्षा को यथावत् रखते हुए संस्कृत-संस्कृति की सप्ताह में एक स्वैच्छिक कक्षा सभी शिक्षा संस्थाएं अपने स्तर पर लगा सकती हैं। अपनी-अपनी मातृभाषा में अनुवाद सहित गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक ३८ से श्लोक ७२ तक के ३४ श्लोक चर्चा का आधार बनाए जा सकते हैं। इनमें से कुछ श्लोक महात्मा गांधी अपनी प्रार्थना में पढ़ा करते थे। इतना मात्र शेष जीवन के लिए अमूल्य पाथेय बन जाएगा। उपस्थित रहने वाले विद्यार्थियों को संस्था एक प्रमाण-पत्र भी दे सकती है। परीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इस ज्ञान की परीक्षा तो जीवन में होगी, कागजों पर नहीं। जहां तक अध्यापक का प्रश्न है, निश्चित ही हर संस्था में एक-दो अध्यापक अध्यात्म रुचि वाले मिल जाएंगे। वे स्वेच्छा से बिना अतिरिक्त पैसा लिए ये कक्षाएं लेने को तैयार हो जाएंगे। प्रयोग करके देखें।
Updated on:
30 Aug 2023 08:13 pm
Published on:
30 Aug 2023 08:09 pm
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