
water
भारत में मानसून की आमद के साथ जब बाढ़ व आपदा प्रबंधन की चिंता की रस्में शुरू ही हुई थीं कि नीति आयोग की रिपोर्ट ने हलक सुखा दिए। आयोग ने पहली बार जल प्रबंधन सूचकांक पेश कर, ऊंघते देश पर पानी के छींटे मारे हैं। यह रिपोर्ट औसत भारतीय की मनोदशा की अभिव्यक्ति भी है कि हमारे पास जो कुछ भी आसानी से और प्रचुरता से उपलब्ध होता है, हम उसकी कीमत नहीं समझते। रिपोर्ट बताती है कि देश में साठ करोड़ लोग जल संकट से जूझ रहे हैं।
सत्तर फीसदी पानी पीने के लायक नहीं है। हमारे 75 फीसदी घरों के अहाते में पीने का पानी नहीं है। भूमिजल, पेयजल, सिंचाई, संचालन नीति जैसे 28 पैमानों पर बने इस सूचकांक में गुजरात शीर्ष पर और झारखंड सबसे नीचे है। 24 बड़े राज्यों में मध्यप्रदेश दूसरे और राजस्थान दसवें स्थान पर है। कैसी विडंबना है कि कई बड़ी नदियों वाले राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार जल प्रबंधन सूचकांक में झारखंड के साथ सबसे निचले पायदान पर हैं। देश में उपलब्ध पानी का 84 फीसदी हिस्सा सिंचाई में तथा उद्योग व घरेलू उपयोग में क्रमश: 12 व 4 फीसदी खर्च होता है।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यह रिपोर्ट जारी करते हुए जब कहा कि समस्या जल की नहीं, जल के नियोजन की है, तो गंगा सफाई व उससे जुड़े पहलुओं को लेकर उनके मंत्रालय की कछुआ गति उनके जेहन में पता नहीं कौंधी या नहीं। जल नियोजन समस्या के लिए सरकारें और हम-आप सभी बराबर जिम्मेदार हैं। शहरों में नाले में तब्दील नदियां, कब्जों का शिकार होते तालाब, मलबे का ढेर बनी बावडिय़ां जब चुनावी मुद्दा बनने लगेंगी, जनता जब जीवन-अमृत पर नेताओं की जवाबदेही तय करने लगेगी तो वोटों की लालची जमात शायद चेते। दुख की बात यह कि बेंगलूरू शहर की उस प्रदूषित झील की तस्वीर हम वोट देते वक्त भूल जाते हैं, जिसका झाग शहर की सडक़ों पर तैर रहा था।
हम जानना ही नहीं चाहते कि हमारे शहर-गांव की नदी को नाला किसने बना दिया। अब वापस उसे सदानीरा बनाने की राह में रोड़े कौन डाल रहा है? जल-अपराध अब रासुका का सबब क्यों नहीं बने? जल संसाधन दूषित करने वाले, कब्जे करने वाले, भूगर्भ जल के सौदागरों और इनसे मिलीभगत करने वाले सरकारी कारिंदे जब जेल में दिखाई देंगे, तो जनता भी जागरूक होने लगेगी। देश के भविष्य की फिटनेस के लिए सबसे जरूरी मुद्दा अमृत-जल प्रबंधन ही है, यह चैलेंज हर नेता और हर नागरिक को समान रूप से स्वीकार करना होगा।
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