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जीत का आधार विज्ञान, हार का राजनीति !

- कोविड का एक साल और मानवता के लिए सबक - भाग-1- कोविड वर्ष ने सूचना तकनीक की शक्ति को रेखांकित किया है: दुनिया के कई हिस्सों में जीपीएस संचालित मशीनों से खेेतीबाड़ी के चलते लॉकडाउन के बावजूद गेहूं, मक्का, चावल जैसे खाद्यान्नों की वैश्विक पैदावार पर महामारी का कोई असर नहीं पड़ा।

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प्रो. युवाल नोआ हरारी,

प्रो. युवाल नोआ हरारी,

प्रो. युवाल नोआ हरारी, (बेस्टसेलर्स 'सैपियंस', 'होमो डेस' और '21 लेसंस फॉर द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरी' के लेखक हैं)

इतिहास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कोरोना का एक साल! इसका सार मानवता को भविष्य के लिए कितने ही सबक दे गया है। हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि कोरोना जिस तरह कई लोगों की मौत का कारण बना उससे यही जाहिर होता है कि कुदरती कहर के आगे मानवता बेबस है, लेकिन सच यह है कि 2020 ने दुनिया को दिखा दिया है कि मानवता किसी भी प्रकार से लाचार या असहाय नहीं है। अब कोई महामारी ऐसी नहीं, जिस पर नियंत्रण न किया जा सके। विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसी चुनौतियों का सामना करना संभव हो गया है। इसके बावजूद इतनी संख्या में लोग संक्रमित क्यों हुए और कई लोगों की जानें क्यों गईं? जवाब है- गलत राजनीतिक फैसलों के कारण।

पुराने जमाने में जब प्लेग फैला था तो लोगों ने इसे 'काली मौत' (ब्लैक डेथ) का नाम दिया। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस बीमारी का कारण क्या है और इस पर कैसे काबू पाया जा सकता है? 1918 में जब इंफ्लुएंजा ने दस्तक दी तो विश्व के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भी इस जानलेवा वायरस की पहचान नहीं कर सके। इसकी रोकथाम के लिए किए गए कई उपाय धरे के धरे रह गए। साथ ही इसके लिए टीका बनाने के प्रयास भी व्यर्थ रहे। यह कोविड-19 से काफी अलग थी। दिसम्बर 2019 के अंत में महामारी की पहली आहट सुनाई दी थी। 10 जनवरी 2020 तक वैज्ञानिकों ने न केवल महामारी के लिए जिम्मेदार वायरस को अलग कर लिया, बल्कि इसकी जीनोम संरचना का अनुक्रम भी तैयार कर लिया और इसे ऑनलाइन प्लेटफॉम्र्स पर प्रकाशित भी कर दिया। कुछ ही महीनों में यह स्पष्ट हो गया कि कौन-से उपाय कोरोना संक्रमण की शृंखला को तोड़ इसकी रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। वायरस का मुकाबला करने के लिए साल भर के भीतर ही कई तरह की वैक्सीन का उत्पादन होने लगा। मानव और रोगाणु के बीच जंग में मानव इससे पहले कभी इतना शक्तिशाली नहीं देखा गया।

जैव-तकनीक की अप्रत्याशित उपलब्धियों के साथ ही कोविड वर्ष ने सूचना तकनीक की शक्ति को भी रेखांकित किया। पुराने जमाने में मानव कभी-कभार ही ऐसी महामारियों को रोक पाता था, क्योंकि मनुष्य रियल टाइम में संक्रमण की शृंखला की निगरानी कर पाने में अक्षम था और लॉकडाउन जैसे उपायों का आर्थिक भार उठाना उसके लिए संभव नहीं था। 1918 में गंभीर फ्लू से संक्रमित व्यक्ति को क्वारंटीन तो किया जा सकता था, लेकिन तब बीमारी के लक्षणों वाले प्रीसिम्प्टोमैटिक और असिम्प्टोमैटिक संक्रमण वाहकों की गतिविधियों को ट्रेस नहीं किया जा सकता था। तब अगर सारी आबादी को कई हफ्तों तक घर में ही रहने को कह दिया जाता तो अर्थव्यवस्था ठप हो जाती, सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता और भुखमरी फैल सकती थी। 2020 के डिजिटल निगरानी युग में संक्रमण की ट्रेसिंग और उसके नियंत्रण की राह आसान हो गई। इससे बढ़कर ऑटोमेशन और इंटरनेट की वजह से लॉकडाउन सफल हो सका, कम से कम विकसित देशों में तो जरूर। एक ओर, विकासशील दुनिया के कुछ हिस्सों में मानवता ने जो भुगता उसने प्लेग महामारी के दिनों की याद दिलाई, वहीं डिजिटल क्रांति ने विकसित दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सब कुछ बदल दिया।

खेती की बात करें तो सैकड़ों वर्षों से खाद्यान्न उत्पादन मानव श्रम पर ही निर्भर था। 90 प्रतिशत लोग खेतीबाड़ी का काम करते थे। आज विकसित देशों में ऐसा नहीं है। अमरीका में केवल 1.5 प्रतिशत आबादी खेतों में काम करती है और न केवल देशवासियों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न की पैदावार होती है, बल्कि अमरीका खाद्यान्न का अग्रणी निर्यातक भी है। खेतों में सारा काम मशीनों से होता है, जिनके संक्रमित होने का कोई खतरा नहीं रहता। आज जीपीएस संचालित मशीन से सारी फसल काटी जा सकती है, वह भी ज्यादा दक्षता के साथ। इसीलिए इसीलिए लॉकडाउन के बावजूद गेहूं, मक्का, चावल जैसे खाद्यान्नों की वैश्विक पैदावार पर कोविड का कोई असर नहीं पड़ा?

लेकिन खाद्यान्न को जनता तक पहुंचाने के लिए क्या फसल उगाना और काटना ही काफी है? नहीं। कई बार कृषि उपज को हजारों किलोमीटर दूर पहुंचाना भी होता है और इसके लिए परिवहन के साधनों की जरूरत होती है। इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि व्यापार, महामारी की कहानी के मुख्य खलनायकों में से एक साबित होता था। जानलेवा रोगाणु समुद्री जहाजी बेड़ों और लंबी दूरी तय करने वाले कारवां के जरिए दुनिया के तमाम हिस्सों में पहुंचे। 'काली मौतÓ भी इसी तरह सिल्क रोड के रास्ते पूर्वी एशिया से मध्य-पूर्व तक पहुंची।

2020 में वैश्विक व्यापार कमोबेश सहजता से जारी रह सकता है क्योंकि इसमें मानव संसाधन की जरूरत पहले की तुलना में काफी कम हुई है। व्यापक तौर पर आज के दौर के स्वचालित कंटेनर जहाज कई टन माल के परिवहन में सक्षम हैं। यह सही है कि कोविड-19 संक्रमण फैलाने में क्रूज जहाजों और यात्रियों से भरे हवाई जहाजों का बड़ा हाथ रहा है, लेकिन यह भी सही है कि वैश्विक व्यापार का अनिवार्य हिस्सा नहीं है टूरिज्म और ट्रैवल। पर्यटक घर में सुरक्षित रह सकते हैं और व्यापारी जूम पर मीटिंग कर सकते हैं, जबकि स्वचालित जहाज और मानव रहित ट्रेन वैश्विक अर्थव्यवस्था को थमने से रोक सकते हैं। 2020 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन हालांकि आसमान से जमीन पर आ गया, लेकिन वैश्विक समुद्री व्यापार में महज 4 प्रतिशत की गिरावट ही दर्ज की गई।
Copyright © Yuval Noah Harari 2021 / / फरवरी 2021 में यह लेख फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित हुआ।

बीती सदियों में यों बदली दुनिया -
-1918 में फ्लू से संक्रमित व्यक्ति को क्वारंटीन किया जा सकता था, लेकिन कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग संभव नहीं थी। 2020 में न केवल यह संभव हुआ, महामारी पर नियंत्रण की राह भी आसान हुई है।
- पहले 90% लोग खेतों में जुटते थे, आज अमरीका में महज 1.5% आबादी खेतों में काम करती है और ऑटोमेशन के जरिए ज्यादा दक्षता के साथ अधिक पैदावार हासिल करती है।
- 1582 में यात्री और माल परिवहन के लिए इंग्लिश मर्चेंट फ्लीट की कुल क्षमता 68 हजार टन थी, जिसे १६ हजार नाविकों की जरूरत थी। 2017 में लांच किए गए ओओसीएल हांगकांग कंटेनर शिप की माल परिवहन क्षमता २ लाख टन है, जिसके लिए सिर्फ 22 सदस्यों के चालकदल की जरूरत है।