
शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की विलक्षण विद्या
घनश्याम तिवाड़ी
नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य और पूर्व शिक्षा
मंत्री, राजस्थान
भारतीय लोक दर्शन में माने गए सात सुखों में 'पहला सुख निरोगी काया' है। निरोगी काया में ही निरोग मस्तिष्क का वास होता है। स्वस्थ शरीर में आत्मा अतिथि की तरह तथा अस्वस्थ शरीर मेें कैदी की तरह रहती है। हमारे यहां के ऋषियों ने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए प्राचीन समय में योग विद्या की खोज की। संस्कृत वाड्मय के अनुसार योग शब्द युज् धातु में घं प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है, जो पाणिनीय व्याकरण के अनुसार तीन अर्थों में पाया जाता है। प्रथम युज् समाधौ अर्थात् समाधि, द्वितीय युजिर योगे अर्थात् जोड़ एवं तृतीय युज् संयमने अर्थात् सामंजस्य। योग क्या है? योग प्रकृति से परमात्मा, शरीर से आत्मा व भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है। पुराण में लिखा है - 'भवनापेन तप्तानां योगो परमौषधम्' अर्थात् संसार के दु:खों से संतप्त प्राणियों के लिए योग ही सर्वश्रेष्ठ औषधि है।
यौगिक ग्रंथों के अनुसार योग का अभ्यास व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना के साथ एकाकार कर देता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ब्रह्माण्ड में उपस्थित सब कुछ परमाणु की अभिव्यक्ति है, जिसने योग में एकत्व को अनुभव कर लिया वही सच्चा योगी है। योग मानवता के मूर्त और आध्यात्मिक दोनों स्वरूपों को श्रेष्ठ बनाता है। योग का व्यापक स्वरूप 2700 ईसा पूर्व की सिन्धु और सरस्वती घाटी सभ्यता में भी देखने को मिलता है। सिन्धु एवं सरस्वती घाटी सभ्यताओं में योग ध्यान मुद्रा की अनेक मूर्तियों के साथ-साथ प्राप्त अनेक मुहरें प्राचीन भारत में योग के अस्तित्व को प्रमाणित करते हैं। ऋग्वेद से भी पूर्व के नासकीय सूत्र में भी ध्यान की चर्चा है। हमारे यहां का ही नहीं, बल्कि विश्व के प्राचीन साहित्यिक ग्रन्थ ऋग्वेद में योग का उल्लेख है।
योग व्यक्ति के शरीर, मन, भावना और ऊर्जा के स्तर पर काम करता है। योग को चार भागों में बांट सकते हैं। हम कर्मयोग में शरीर, ज्ञानयोग में मन, भक्ति योग में भावना तथा क्रियायोग में ऊर्जा का प्रयोग करते हैं। योग साधना में अष्टांग योग - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि का अभ्यास सबसे अधिक किया जाता है। बंध और मुद्रा, षट्कर्म युक्ताहार, मंत्र जप आदि भी योग अभ्यास के साधन हैं।
लेखक के पास जब राजस्थान के शिक्षा मंत्री का दायित्व था, तब 16-22 जून, 2005 को एक सप्ताह के योग प्रशिक्षण शिविर का आयोजन शिक्षा विभाग की तरफ से डॉ. राधाकृष्णन शिक्षा संकुल, जयपुर में किया गया था। शिविर में राजकीय विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक-शिक्षिकाओं को योग गुरु स्वामी रामदेव ने प्रशिक्षण दिया। राजस्थान के विद्यालयों में जुलाई 2005 से योग शिक्षा प्रारम्भ कर दी गई। इस प्रकार योग शिक्षा प्रारम्भ करने वाला राजस्थान, देश का पहला राज्य बना।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस मनाने का आह्वान करते हुए कहा कि योग प्राचीन भारतीय परम्परा और संस्कृति की अमूल्य देन है। योग अभ्यास शरीर एवं मन, विचार एवं कर्म, आत्मसंयम एवं पूर्णता की एकात्मकता तथा मानव एवं प्रकृति के बीच सामंजस्य प्रदान करता है। यह स्वास्थ्य एवं कल्याण का पूर्णतावादी दृष्टिकोण है। योग केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि स्वयं के साथ, विश्व एवं प्रकृति के साथ एकत्व खोजने का भाव है।
11 दिसम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 21 जून को 'अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस' मनाने का संकल्प सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया। अपने संकल्प में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकार किया कि योग स्वास्थ्य तथा कल्याण के लिए पूर्णतावादी दृष्टिकोण प्रदान करता है। 21 जून, 2015 से अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष विश्व स्तर पर मनाया जा रहा है। योग आत्मा को परमात्मा से, मनुष्य को मनुष्य से व एक देश को दूसरे देश से जोडने का मूल मंत्र है। हमारी महान प्राचीन भारतीय संस्कृति 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना योगाभ्यास के माध्यम से ही साकार हो सकती है।
योग का संबंध किसी धर्म विषेष से नहीं है। महर्षि पतंजलि ने कहीं भी योग को धर्म अथवा उपासना से नहीं जोड़ा है। योगशास्त्र गीता के बारे में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने अपने निर्णय (27.01.2012) में कहा है कि 'गीता (योगशास्त्र) भारतीय दर्शन की पुस्तक है, न कि भारतीय धर्म की। ओऽम् का प्रणवनाद ब्रह्माण्ड के कण-कण में समाया हुआ है। योगाभ्यास के समय ओऽम् के उच्चारण से शान्ति और सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बिन्दु संख्या 4.27 में कहा गया है कि 'भारत का ज्ञान' में आधुनिक भारत और उसकी सफलताओं और चुनौतियों के प्रति प्राचीन भारत का ज्ञान और उसका योगदान शामिल होगा, जिसमें खगोल विज्ञान, दर्शन, योग आदि को शामिल किया जाएगा।' आजकल विद्यालयों में विद्यार्थियों की बुद्धिलब्धि का ही विकास हो पा रहा है। योग से भावात्मक लब्धि एवं आध्यात्मिक लब्धि का विकास होता है। पाश्चात्य संस्कृति भोगवादी है, जबकि भारतीय संस्कृति योगवादी है। योग के लाभों की जानकारी सामने आने के बाद विश्व के अधिकांश देशों की जनता योगाभ्यास की ओर अग्रसर हो रही है।
Published on:
21 Jun 2022 06:34 pm
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