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ऋतु-1

हम जिसे देख समझ पा रहे हैं उस स्थावर-जंगम जगत् की रचना उन्हीं सिद्धान्तों पर हुई है जिनसे इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि हुई।

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ramdeep mishra

Mar 29, 2015

हम जिसे देख समझ पा रहे हैं उस स्थावर-जंगम जगत् की रचना उन्हीं सिद्धान्तों पर हुई है जिनसे इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि हुई। यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे। सृष्टि रचना में ऋषि-पितर-देव प्राणों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

मूल में इन प्राणों की प्रक्रिया से ऋत से सत्य बनते हैं। अग्नि और सोम ही सर्वत्र अलग-अलग स्वरूपों में क्रियाशील रहते हुए सृष्टि-स्थिति-संहार क्रम को बनाए रखते हैं। प्रजापति से लेकर सम्वत्सर, ऋतुचक्र और पिण्ड रूपों में यही प्राण तत्व दिखते हैं।

एक से अनेक होने की ब्रह्म की इच्छा के परिणाम में सृष्टि की रचना हुई। प्रारम्भ में ब्रह्म रूप ऋषि प्राणों के तपन से पितर उत्पन्न हुए। ऋषि और पितर प्राणों से देव-दानव उत्पन्न हुए। ऋषि-पितृ-देव प्राणों से इस स्थावर जंगम जगत् की उत्पत्ति हुई।

सबसे पहले जो सत्य बना वह अग्नि है। जो ऋत है वह सत्य के आकार को प्रस्तुत करने के लिए प्रसव करता है और इस सवन के कारण उसे सोम कहते हैं। प्रसरण स्वभाव वाला अग्नि अपने उक्थ स्थान से बाहर पृष्ठ भाग के अन्त तक अनवरत संचित होता है।

ऋत जब सत्य भाव में स्थापित होता है तो उसकी बाहरी सीमा प्रधि या पृष्ठ भाग कहलाती है। इस चयन क्रम में तीन प्रकार का सवन होने से अग्नि के तीन रूप अग्नि-वायु-आदित्य बनते हैं। विकास का पूर्व रूप अग्नि है, पहला विकास वायु और अन्तिम विकास आदित्य है। अग्नि से वायु सूक्ष्म है, वायु से आदित्य सूक्ष्म है। आदित्य के अवयव विरल अवस्था में रहते हैं। ये तीनों ऋषि प्राण अंगिरस कहे जाते हैं।

इस विकास भाव के विपरीत संकोच स्वभाव वाला सोम बाहर से भीतर जाता है। यह पृष्ठ भाग में संचित होता है और इसमें प्रसव के तीन प्रकार होने से सोम के तीन रूप हो जाते हैं-सोम, वायु, आप:। प्रथम संकोचन से पहले जिसमें अवयव बिलकुल बिखरे रहते है वह सोम अवस्था है। उसका प्रथम संकोचन वायु और अन्तिम संकोचन आप: (जल) है। सोम से वायु स्थूल है। वायु से जल स्थूल है। ये भृगु नामक ऋषि प्राण कहलाते है।

इस तरह अग्नि के तीन और सोम के तीन कोशों से परिपूर्ण पृथ्वी का रूप है। नाभि या केन्द्र से पृष्ठ या प्रधि तक अग्नि-वायु-आदित्य और पृष्ठ से नाभि तक तीन कोश सोम-वायु-आप: हैं। अग्नि जब जल के साथ मिलकर संघर्षरत रहता है तब पृथ्वी का रूप बनता है। वायु जब वायु से संयुक्त होता है तब अन्तरिक्ष बनता है। आदित्य जब सोम से संयुक्त होता है तब वह ज्योतिर्मय हो जाता है और द्युलोक कहलाता है।

सोम ही अग्नि में हवन करने पर प्रज्वलित होकर पृथ्वी (पिण्ड) की नाभि में (केन्द्र) अग्नि हो जाता है। अग्नि अपनी प्रसरण क्रिया का अतिशय होने पर पशुरूप बन कर प्रधि में यानी पृष्ठ भाग में सोम रूप बन जाता है। समान बल वाले इन अग्नि-सोम की विकास संकोच प्रक्रिया में रुकावट हो जाती है।

सोम की संकोच गति को अग्नि और अग्नि के विकास को सोम रोक देता है, यह रुकावट ही यम कहलाती है। इस तरह अग्नि के दो प्रकार हैं-एक सोम से अनुकूल सम्बन्ध रखने वाला यज्ञ रूप और दूसरा सोम को रोक देने वाला। दूसरा रूप अंगिरा से उत्पन्न वायु है। यही यम कहलाता है। यम के भी तीन रूप मनु-यम और मृत्यु है।

ये तीनों अग्नि-यम-सोम देव पितर माने जाते हैं। अग्नि सम्बन्धी देवताओं की उत्पत्ति अंगिरा से मानी हैं। अंगिरा के ज्योति स्वभाव के कारण ये अग्नि तेजोमय होता है। सोम भृगु के स्नेहन कर्म रूप रसमय होता है। यम न तेजोमय है और न स्नेह रूप है। अंगिरा अवरलोक के पितर है। यम मध्यम लोक के और भृगु उससे ऊपर परलोक के पितर हैं।

मध्यलोक में रहने वाला यह अकेला यम रूप अग्नि, अंगिरा के तेजोमय तीन रूपों (अग्नि-वायु-आदित्य) और भृगु के तीन स्नेहन रूपों (सोम-वायु-आप:) ये सात संस्थाओं में व्यापक रहता है। पार्थिव, अन्तरिक्ष्य और द्युलोक के सभी दिव्य पदार्थ इन सात संस्थाओं वाले पितरों द्वारा शरीर धारण करने के कारण सात संस्थाओं के रूप में ही उत्पन्न होते हैं। इनमें यम अंगिरा का ही रूप है। अत: प्रधानत: अग्नि और सोम दो ही समझने चाहिए।

यम अग्नि दक्षिण भाग का है, सोम उत्तर भाग का है। दक्षिण का नीचे रहने वाला अग्नि ऊपर की ओर जाता है। ऊपर से सोम निरन्तर नीची दिशा की ओर आता है। तीन प्रकार की अग्नि, तीन प्रकार का यम और तीन प्रकार के सोम में विभक्त तीन भाव पितर कहे जाते हैं।

उत्पत्ति, स्थिति और संहार ये इन तीनों के अधीन हैं। इस तरह देव वर्ग, पंचभूत वर्ग और उनकी समष्टिभूत यह सारी प्रजा इन्हीं अग्नि यम सोम से उत्पन्न होती है, इन्हीं के सहारे जीवित रहती है और इनके द्वारा ही मर जाती है। सोम से प्रजा की उत्पत्ति, अग्नि से जीवन धारा चलती है और यम से मृत्यु हो जाती है।

अग्नि प्रधान आग्नेय पितर दक्षिण आकाश में रहते हुए उत्तर आकाश की ओर दौड़ते रहते हैं। ये अंगिरा सम्बन्धी पितर अवर कहलाते हैं। यम सम्बन्धी पितर मध्य आकाश में रहते हुए अनवरत नीचे गिरते रहते हैं। ये मध्यम अंगिरस पितर हैं। सोम प्रधान पितर उत्तर आकाश में रहते हुए दक्षिण आकाश की ओर दौड़ते रहते हैं। भृगु प्राण की प्रधानता रहने से ये सौम्य पितर भृगु पितर कहे जाते हैं। प्रकृति चक्र को ये पितर ही चलाते हैं।

दिव्य-ऋतु-प्रेत पितर तीनों में अग्नि-यम-सोम अनुस्यूत रहते हैं। दिव्य पितर तीन प्रकार के हैं-अन्नविध, अन्नादविध और अनुभयविध (न अन्न न अन्नाद)। इनमें सौम्य पितर (सोम प्रधान) अन्नविध के तीन प्रकार अग्निष्वात्त पितर, बर्हिषद पितर और सोमसद पितर हैं। अग्नि में हवन करने पर जो खाया करते हैं वे अग्निष्वात्त कहलाते हैं। जहां जल सूख जाता है वह सूखी हुई अवस्था बर्हिस् कहे जाते हैं।

सभी औषधि वनस्पति-अन्न वृक्षादि बर्हिस् हैं और इन सूखे पदार्थों के आधार पर भोजन करते हुए जो स्थित रहते हंै वे बर्हिषद कहे गए हैं। गीले पदार्थों (जल आदि) के आधार पर भोजन करते हुए स्थिति पाले वाले पितर सोमसद कहे जाते हैं। अग्नि-यम-सोम सम्बन्धी पदार्थों में ये सौम्य पितर निश्चित ही भीतर प्रविष्ट रहते हैं।

तीन आग्नेय पितर अन्नादविध रूप के होते हैं। देवताओं के सेवन योग्य अन्न-हविषान्न को खाने वाले हविर्भुक हैं। तेज के रसमय तत्त्व आज्य यानी घी को पीने वाले आज्यप कहे जाते हैं। हविष्यान्न खाने वाले पितर हविर्भुक्, सोम पीने वाले सोमप कहे जाते हैं। जो इन दोनों ही प्रकार में नहीं हैं वे पितर सुकाल सुकाली और सुस्वधा कहे जाते हैं। इस तरह ये तीन दिव्य पितर सात प्रकार के हो जाते हैं।

इन तीन प्रकृति वाले सात दिव्य पितरों के देवलोक में भिन्न-भिन्न लोक हो जाते हैं। अग्निष्वात्त् नाम के अमूर्त भाव के मध्यम पितर दक्षिण दिशा में रहते हैं ये वैभ्राज या विभ्राजमान (चमकने वाले) कहलाते हैं। बर्हिषद भी अमूर्त भाव के मध्यम पितर हैं। जो सनातन या संतानक कहे जाते हैं।

हविर्भुक् पितर मरीचि से उत्पन्न मारीच नाम के ये इन्द्र प्राण प्रधान मूर्तिमान होते हैं और परपितर कहे जाते हैं। (ये क्षत्रियों के पितर माने जाते हैं)। तेजस्वी आज्यप पितरों में विश्वेदेव प्राण की प्रधानता होती है और ये भी मूर्तिमान परपितर कहे जाते हैं। (ये वैश्यों के पितर हैं)। ज्योतिरूप में भासित सोम या पितरों में अग्नि प्राण प्रधान है ये भी मूर्तिमान परपितर हैं (ये ब्राह्मणों के पितर हैं)। सुकाली नाम के अवर पितर मानस पितर हैं। (पोषण पाने वाले शूद्रों के पितर मूर्तिमान हैं)।

सृष्टि सम्पादक मूल तत्त्व भृगु और अंगिरा ही क्रमश: स्नेहन और तेज लक्षण वाले सोम तथा अग्नि हैं। सोम के विवर्तभूत पितृप्राण और अग्नि के विवर्तभूत देव प्राण हंै।

सम्वत्सर प्रजापति रूप है। उसके ऋत और सत्य ये दो शरीर हैं। उत्तरायण से प्रारम्भ कर सम्वत्सर पर्यन्त परिवर्तन क्रम में होने वाला वृद्धि-ह्रास क्रम से जुड़ा कोई एक अग्नि ऋत नाम का सम्वत्सर शरीर है। फिर दक्षिणायन से आरम्भ होकर सम्वत्सर पर्यन्त विपरिवर्तनमान वृद्धि ह्रास क्रम से जुड़ा कोई एक सोम रूप है। यह सत्य नाम का दूसरा शरीर है।

किसी वृत्त का निर्माण तब होता है जब वृत्त कुटिल भाव यानी तिरछी गति से आगे बढ़ता है। भूपिण्ड स्वप्राण अथवा अपनी गति से सीधा जाना चाहता है। सूर्य अपने आकर्षण से किसी एक बिन्दु द्वारा खींचता है। पुन: भूपिण्ड सीधा जाना चाहता है।

सूर्य इसे पुन: अपनी ओर चक्रित करता है। इस धारावाहिक प्रक्रिया (चंक्रमण) से गति मार्ग का प्रत्येक बिन्दु कुटिल या तिरछा होता जाता है। यह कुटिलता यानी तिरछापन छद्मगतित्व है जिससे क्रान्तिवृत्त का स्वरूप बनता है। सूर्य के चारों ओर भूपिण्ड का परिभ्रमण मार्ग क्रान्तिवृत्त 'सर्वत्सरÓ कहलाता है जिसे परोक्ष भाषा में 'सम्वत्सरÓ कहते हैं। 'सर्वत: त्सरन् गच्छति भूपिण्ड: स्वर्याभ्रमणमार्गे।Ó शतपथ में कहा है-'स प्रजापति: सर्वत्सरोऽभवत्। सर्वत्सरो ह वै नामैतत्-यत् सम्वत्सर:।Ó (11.1.6.12)

ज्योतिषचक्रात्मक खगोल वृत्त के 360 अंशों में से उत्तर-दक्षिण ध्रुव वाले अद्र्ध खगोल का परिमाण षड्भान्तर अर्थात् 180 अंश माना गया है। इसके मध्य में पूर्वापरवृत्त है जिसे बृहतीछन्द और ज्योतिष में विष्वद्वृत्त कहते हैं। इसके ठीक 90 अंश पर उत्तर में उत्तरध्रुव और 90 अंश दक्षिण में दक्षिण धु्रव है।

क्रान्तिवृत्त का पृष्ठीकेन्द्र 'कदम्बÓ और विष्वद्वृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र 'ध्रुवÓ माना गया है। मध्य में स्थित विष्वद्वृत्त से 24 अंश उत्तर और 24 अंश दक्षिण का कुल 48 अंश का परिसर मण्डल ही सम्वत्सर कहलाता है। इसके दो स्वरूप वयोनाध और वय माने गए हैं। छन्द-रूप सम्वत्सर वयोनाध है। यही भातिसिद्ध कालात्मक सम्वत्सर है। इस छन्द से छन्दित (सीमित) वस्तु स्वरूपात्मक सम्वत्सर वय है जो सत्तासिद्ध अग्न्यात्मक सम्वत्सर है। अड़तालीसवें अंश की परिधि तक समन्वित या आबद्ध वृत्त ही वह क्रान्तिवृत्त है जिस पर हमारी पृथ्वी यानी भूपिण्ड घूम रहा है।

सामाजिक संस्कारों से जुड़ा यह स्तंभ नई पीढ़ी को भी पढ़ाएं।