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हजार सालों का इतिहास बताती ‘सीक्रेट्स ऑफ कोहिनूर’

आर्ट एंड कल्चर: डॉक्यूमेंट्री सीरीज के लेखक ने सैकड़ों साल पहले के इतिहास को समकालीन प्रसंगों से जोड़ सहज संप्रेष्य बना दिया है

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Patrika Desk

Aug 21, 2022

प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक

वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकटरमण ने कहा था, भारत की आजादी 'कोहिनूर' के बिना अधूरी है। सदियों से भारत भूमि से दूर एक हीरा आखिर इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है हमारे लिए। इसी को रेखांकित करती है, फिल्मकार नीरज पांडेय की डिस्कवरी प्लस पर हाल ही में रिलीज हुई लगभग 45-45 मिनट की दो डॉक्यूमेंट्री सीरीज, 'द सीक्रेट्स ऑफ कोहिनूर'। सीरीज अंत में कहती है, अब आप समझें, कोहिनूर क्या है आपके लिए, सदियों की विरासत, गौरवशाली इतिहास, भारत की पहचान, बेशकीमती रत्न, अभिशप्त हीरा या चमकता पत्थर... लेकिन वे इस हिदायत के साथ हमें डॉक्यूमेंट्री के खत्म होने पर सोचने के लिए छोड़ते हैं कि हमारी विरासत और इतिहास पर हमारी सोच मायने रखती है।

वास्तव में सदियों से जिस तरह हमें अपने ही इतिहास और विरासत से दूर रखने की कोशिशें चलती रहीं, क्या आश्चर्य कि आज वह 'सीक्रेट्स' के रूप में हमारे सामने आ रही हैं।
नीरज पांडेय और निर्देशक राघव मोहन जयरथ की टीम ने इसके पहले पुरातात्त्विक स्थल 'सिनौली' पर इसी तरह की सीरीज बना कर हमें अपनी विरासत पर गौरवान्वित होने का अवसर दिया था। 'कोहिनूर' को भी उसी क्रम में देखा जाना चाहिए।
वास्तव में इतिहास और विरासत मात्र जानकारियां भर नहीं होतीं, बल्कि ये हजारों साल बाद भी हमारे आत्मविश्वास के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाती हैं। यहां सूत्रधार की भूमिका में मनोज वाजपेयी हैं, जो शब्दों को जीवंत करना जानते हैं। वे इतिहास की गूढ़ता भी एक कथावाचक की सहजता से अभिव्यक्त करते हैं। निश्चित रूप से इसका श्रेय लेखक वैभव मुथा को भी दिया जाना चाहिए, जिन्होंने सैकड़ों साल पहले के इतिहास को समकालीन प्रसंगों से जोड़ सहज संप्रेष्य बना दिया है।

नीरज पांडेय 'कोहिनूर' की कथा शुरू से शुरू करते हैं, जब गोलकुंडा के खदान से दुनिया का यह नायाब खनिज टुकड़ा बाहर आया। इसे काकतीय वंश के राजा को भेंट किया गया। महाराज ने उस हीरे को राज्य की देवी भद्रकाली की मूर्ति की बायीं आंख में जड़वा दिया। बख्तियार खिलजी के आक्रमण में भद्रकाली का मंदिर भी टूटा और हीरा खिलजी के पास चला गया। खिलजी के बाद वह हीरा बाबर के अधिकार में आया, और यहां से हीरे का लिखित उल्लेख मिलता है। बाबरनामा में इसका 'बाबर का हीरा' के रूप में उल्लेख है। और इसकी कीमत की तुलना पूरे विश्व के सभी लोगों के लिए ढाई दिन के खाने से आंकी गई है।

इस सीरीज में इस हीरे के नामकरण की दिलचस्प कहानी भी है, कि किस तरह समय और काल के थपेड़ों को झेलता यह नादिरशाह के हाथ में पहुंचा तो उसकी आंखें खुली रह गईं, और उसके मुंह से निकला 'कोहिनूर'। पर्सियन यानी फारसी में इसका अर्थ है 'रोशनी का पहाड़'। और फिर इस नाम के साथ यह इस तरह जुड़ा कि हजार सालों में 793 कैरेट से 105 कैरेट तक पहुंचने के बावजूद 'कोहिनूर', आज भी 'कोहिनूर' ही है।
वास्तव में कोहिनूर के बहाने नीरज पांडेय लगभग हजार साल के इतिहास से रू-ब-रू होने का मौका देते हैं। फिल्म में पेंटिंग्स और स्केच के साथ सिनेमेटोग्राफर अरविंद सिंह इतिहास के क्षणों को जीवंत करते लगते हैं, और समय में प्रवेश का अवसर देते हैं। वास्तव में 'सीक्रेट्स ऑफ कोहिनूर' इस धारणा को तोड़ती है कि डॉक्यूमेंट्री में नीरस जानकरियां भर होती हैं। यहां जानकारियां भी हैं, विचार भी हैं, और किसी सफल कहानी की तरह बांधे रखने वाला क्लाइमैक्स भी।