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आत्म-दर्शन: सद्विचार का महत्त्व

सनातन-शास्त्र कथन है कि भवरोग औषधि है - सद्विचार।

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स्वामी अवधेशानंद गिरी

स्वामी अवधेशानंद गिरी

स्वामी अवधेशानंद गिरी

आध्यात्मिक विचार परिपक्व होते ही जीवन में आनन्द-माधुर्य, ऐश्वर्य-सौन्दर्य आदि दिव्यताएं स्वत: स्फुरित होने लगती हैं। सद्विचार व शुभ-संकल्प में प्रतिकूलताओं के परिहार का अपूर्व सामथ्र्य विद्यमान होता है। सनातन-शास्त्र कथन है कि भवरोग औषधि है - सद्विचार। अध्यात्म जीवन पूर्ण निस्वार्थ होता है। आध्यात्मिक विचारों के अभाव में व्यक्ति पथ-भ्रष्ट हो जाता है। अधिक सांसारिक ज्ञान अर्जित करने से अहंकार आ सकता है, परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान जितना अधिक अर्जित करते हैं, उतनी ही विनम्रता आती है।

अवकाश का समय व्यर्थ मत जाने दो। श्रेष्ठ विचार ही मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पदा है। अच्छा साहित्य जीवन के प्रति आस्था ही उत्पन्न नहीं करता, वरन् उसके सौंदर्य पक्ष का भी उद्घाटन कर उसे पूजनीय बना देता है। प्रेरणादायक सुविचार को पढ़कर उन्हें आत्मसात कर व्यक्ति अपने जीवन में नई ऊर्जा का संचार कर सकता है तथा निराशा और नकारात्मक विचारों से भरे जीवन में आशा की किरण जगा सकता है। अच्छे सुविचार कठिन से कठिन कार्य को करने के लिए आपके मन में एक नया उत्साह और उमंग पैदा करते हैं, जिससे उस कार्य को करने की प्रेरणा मिलती है और व्यक्ति सफलता की सीढिय़ां चढ़ता है।