
आत्म-दर्शन : ब्रह्मचर्य का महत्त्व
आचार्य विद्या सागर
भगवान महावीर ने जो सूत्र हमें दिए, उनमें पांच सूत्र प्रमुख हैं। इनमें से चौथा सूत्र है ब्रह्मचर्य, जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। पतित से पावन बनने का यह एक अवसर है। यदि हम इस सूत्र का आलम्बन लेते हैं, तो अपने आपको पवित्र बना सकते हैं। ब्रह्मचर्य की व्याख्या आप लोगों के लिए नई नहीं है, किन्तु पुरानी होते हुए भी उसमें नएपन के दर्शन अवश्य मिलेंगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ है-अपनी परोन्मुखी उपयोग धारा को स्व की ओर मोडऩा, बहिर्दृष्टि-अन्तर्दृष्टि बन जाए। बहिर्जगत शून्य हो जाए, अन्तर्जगत का उद्घाटन हो।
यह ध्यान रहे कि ब्रह्मचर्य का अर्थ वस्तुत: सही-सही मायने में है - 'चेतन का भोग।' ब्रह्मचर्य का अर्थ भोग से निवृत्ति नहीं, भोग के साथ एकीकरण और रोग निवृत्ति है। जिसको आप लोगों ने भोग समझ रखा है, वह है रोग का मूल और ब्रह्मचर्य है जीवन का एकमात्र स्रोत। विषय वासना मृत्यु का कारण है, मृत्यु दुख है, दुख का कूप है और ब्रह्मचर्य जीवन है, आनन्द है, सुख का कूप है। आप सुख चाहते हैं, दुख से निवृत्ति चाहते हैं तो चाहे आज अपनाएं, चाहे कल अपनाएं, कभी भी अपनाएं, किन्तु आपको अपनाना यही होगा। रोग की निवृत्ति के लिए औषधपान परमावश्यक होता है। बिना औषधपान के रोग ठीक नहीं हो सकेगा।
आज तक जितने भी अनन्त सुख के भोक्ता बने हैं, उन सबने इसका समादर किया है और जीवन में अपनाया है, अपने जीवन में इसको स्थान दिया है, मुख्य सिंहासन पर विराजमान कराया है इसे, भोग-सामग्री को नहीं। ब्रह्मचर्य पूज्य बना, किन्तु भोग सामग्री आज तक पूज्य नहीं बनी। ब्रह्मचर्य का विरोधी धर्म है काम, इस काम के ऊपर विजय प्राप्त करनी है। यह काम और कोई दूसरी चीज नहीं है, यह वही उपयोग है, जो कि बहिवृत्ति को अपनाता जा रहा है, उसी का नाम है काम। वही उपयोग, जो कि भौतिक सामग्री में अटका हुआ है।
Published on:
14 Jun 2021 08:50 am
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