23 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

शरीर ही ब्रह्माण्ड

धर्म का व्यावहारिक स्वरूप इतना व्यापक है कि इसे एक सूत्र या परिभाषा में बांधकर नहीं रखा जा सकता। मोटे रूप से देखें तो धर्म व्यक्ति और उसके भगवान् के बीच का रिश्ता है। वह भगवान् को किस रूप में देखता है और मानता है, उसी के अनुरूप उसके जीवन का दर्शन बनता है। भगवान् को मैं पिता मानूं, मां कहूं, मित्र कहूं या प्रेमी कहूं तो मेरी सारी भक्ति और उपासना का क्रम ही बदल जाएगा। नास्तिक को भी नास्तिकता में आस्था होती है।

less than 1 minute read
Google source verification

जयपुर

image

Patrika Desk

Oct 07, 2022

sharir_hi_brahmmand.png

धर्म का व्यावहारिक स्वरूप इतना व्यापक है कि इसे एक सूत्र या परिभाषा में बांधकर नहीं रखा जा सकता। मोटे रूप से देखें तो धर्म व्यक्ति और उसके भगवान् के बीच का रिश्ता है। वह भगवान् को किस रूप में देखता है और मानता है, उसी के अनुरूप उसके जीवन का दर्शन बनता है। भगवान् को मैं पिता मानूं, मां कहूं, मित्र कहूं या प्रेमी कहूं तो मेरी सारी भक्ति और उपासना का क्रम ही बदल जाएगा। नास्तिक को भी नास्तिकता में आस्था होती है। उसके लिए यही धर्म का स्वरूप है। राज धर्म, गृहस्थ धर्म, देश धर्म आदि भी धर्म के सामाजिक स्वरूप हैं। इनको भी व्यक्तिगत धर्म की परिभाषा के साथ पिरोना पड़ेगा। अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार आदि भी व्यक्ति धर्म समझ कर ही करता है। ये व्यक्ति के आसुरी प्राणों का धर्म है। इनके बिना शाश्वत धर्म का कोई महत्त्व ही नहीं है।
वैसे भी धर्म तो आचरण की बात है। आचरण ही धर्म का प्रतिबिम्ब है। हमारे पुरुषार्थ चतुष्टय में सबसे पहले धर्म ही आता है। फिर अर्थ, काम और मोक्ष है। अर्थात ये तीनों ही धर्म पर आधारित होने चाहिए।