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शुक्र में सात पीढ़ियों के अंश – सप्त पितृांश

कन्या के दाहिने हाथ को पकडक़र वर कहता है कि सौभाग्य के लिए तुम्हारे हाथ को पकड़ रहा हूं। अपने पति के साथ वृद्ध शरीर वाली होओ। भग, अर्यमा, सविता, इन्द्र ने तुमको मुझे गृहस्वामिनी बनाने के लिए दिया है। मैं विष्णु तुम लक्ष्मी हो। मैं साम तुम ऋक, मैं द्यौ तुम पृथ्वी हो। आओ, हम दोनों विवाह करें।

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जयपुर

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Patrika Desk

Nov 04, 2022

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कन्या के दाहिने हाथ को पकडक़र वर कहता है कि सौभाग्य के लिए तुम्हारे हाथ को पकड़ रहा हूं। अपने पति के साथ वृद्ध शरीर वाली होओ। भग, अर्यमा, सविता, इन्द्र ने तुमको मुझे गृहस्वामिनी बनाने के लिए दिया है। मैं विष्णु तुम लक्ष्मी हो। मैं साम तुम ऋक, मैं द्यौ तुम पृथ्वी हो। आओ, हम दोनों विवाह करें। साथ मिलकर सन्तान-शक्ति को धारण करें। वर कन्या से कहता है कि तुम इस प्रस्तर पर आरूढ़ होकर इसके समान दृढ़ संकल्पकर्ता बनो। हे सखे! तुम सप्त लोकों में प्रसिद्ध होओ, मेरी अनुवर्तिनी बनो। विष्णु तुम्हें चलावें।
इस प्रकार विवाह संस्कार से सुसंस्कृत नर-नारी के युग्म को भी अग्नि-सोम युग्म की तरह देखते हैं। ‘यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ का सिद्धान्त इस शरीर पर भी लागू होता है। पुरुष (अव्यय) और प्रकृति (परा-अपरा) ही सूक्ष्म भाव में इस शरीर को चलाते हैं। शरीरों के विवाह शरीर समाप्ति पर समाप्त हो जाते हैं, तलाक के साथ टूट जाते हैं। आत्मा के विवाह सूक्ष्म शरीर के होते हैं।