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प्राणों का आदान-प्रदान

बीज सदा सोम रूप होता है, अग्नि में आहूत होता है। रेत पुन: रज-शोणित या शुक्र में आहूत होकर स्थूल शरीर धारण करता है। पृथ्वी और द्युलोक के मध्य अन्तरिक्ष योनि है इसमें पर्जन्य रसों को दुहने वाली (आकर्षित करने वाली) पृथ्वी गर्भ को (जल रूप) में धारण करती है।

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जयपुर

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Patrika Desk

Nov 11, 2022

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द्युलोक मेरा उत्पादक है, पिता है। द्युलोक वर्षण करता है। वर्षा से अन्न पैदा होता है। पर्जन्य (बादल) से विद्युत का योग होता है, तब वर्षण होता है। जल रूप सोम पृथ्वी की अग्नि में आहूत होता है। सृष्टि के सभी प्राणी इसी क्रम से पृथ्वी पर आते हैं। कुछ अन्न रूप ग्रहण करते हैं, कुछ छोटे प्राणी वर्ग रूप में उत्पन्न होते हैं। अन्न रूप सोम जठराग्नि में आहूत होता है। अन्न के स्वरूप के अनुरूप ही प्राणी के स्वरूप का निर्माण होता है। अन्त में पुन: सोम रूप बीज तैयार होता है। मानव शरीर में इसे रेत या वीर्य कहते हैं। बीज सदा सोम रूप होता है, अग्नि में आहूत होता है। रेत पुन: रज-शोणित या शुक्र में आहूत होकर स्थूल शरीर धारण करता है। पृथ्वी और द्युलोक के मध्य अन्तरिक्ष योनि है इसमें पर्जन्य रसों को दुहने वाली (आकर्षित करने वाली) पृथ्वी गर्भ को (जल रूप) में धारण करती है।