
विवाह प्रक्रिया में वधू आकर वर से संयुक्त होती है। दोनों की युति तभी हितकारी और समृद्धिवर्धक होती हुई नि:श्रेयस के मार्ग पर अग्रसर हो सकती है जब दोनों के प्राण समन्वित हों। चूंकि वधू के प्राण पिता में रहते हैं। अत: मंत्रों द्वारा इस प्राण को वहां से विस्थापित करके वर के प्राणों में प्रतिष्ठित किया जाता है। यही मूल बन्धन है। दोनों के प्राणों का एकाकार होना ही मनों का योग है। वाक् (शरीर) भले दो रहें। इस प्रक्रिया से वधू का पितृ पक्ष सम्बन्ध सदा के लिए विच्छेद हो जाता है। चूंकि यह प्राणों का ‘प्रदान’ स्वयं पिता करता है, सहर्ष करता है, भावी कल्याण की श्रेणी में आता है, अत: दान कहलाता है। इसमें पुन: आदान नहीं होता। शास्त्रों में यज्ञ, तप, दान (आत्मांश का) धर्म के रूप कहे गए हैं- गीता 17/20 । अत: कन्यादान स्वत: धर्म बन जाता है।
कन्या को धरोहर रूप में ही माना जाता था। विदाई के पश्चात् कण्व ऋषि के मुख से अनायास ही निकलता है कि कन्या वास्तव में पराया धन होती है। आज शकुंतला को पति के पास भेजकर मेरा मन वैसे ही निश्चिन्त हो गया है, जैसे किसी की धरोहर वापस कर दी गई हो-अर्थाे हि कन्या परकीय एव तामद्य संप्रेष्य परिग्रहीतु:। जातो ममायं विशद: प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।। (अभिज्ञान शाकुंतलम् 4.22)
Updated on:
18 Nov 2022 10:00 pm
Published on:
18 Nov 2022 07:28 pm
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