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शरीर ही ब्रह्माण्ड: वाक् ही सृष्टि

प्राणकला और वाक्कला ही निर्माण का आधार बनती हैं। प्राण कला से अक्षर-प्राण सृष्टि तथा वाक् से पदार्थ सृष्टि होती है। वाक् व्यापक है, शान्त है, एक है। शब्द व्याप्य है, विविध भावों से उत्पन्न होने वाले हैं। शब्द की उत्पत्ति का कारण वाक् है। सृष्टि में कोई स्थान वाक् से रिक्त नहीं है।

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रहस्यपूर्ण शब्द है रस। नित्य प्रवाहित रहने वाला तत्त्व है। प्रवाह ही फैलाव है—विस्तार है—आनन्द है। प्रवाह का उपादान गतिमान प्राण होता है। जीवन में इसके पर्यायवाची भी अनन्त हैं। जिन विषयों से इन्द्रियों को तृप्ति मिलती है, उनको रसीला कहा जाता है। यद्यपि इन्द्रियां स्वयं कुछ भी ग्रहण नहीं करतीं। ग्रहण तो मन करता है। आत्मा करता है। कोई भी शास्त्रीय नृत्य, संगीत हो, हमें भावविभोर कर देता है। हम खो जाते हैं, स्वयं को भूल जाते हैं। साहित्य, कला आदि विषय भी हमको अभिभूत कर देते हैं। यहां तक कि सद्पुरुषों के वचनों से हम मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जीवन का यह पहला निष्कर्ष है कि हर कर्म रसमय है।

जीवन का सुख ‘रस’ में है। नीरस जीवन मृत्यु का पर्याय है। ‘‘रसो वै स:’’- रस ही ब्रह्म है। चूंकि जीवन का प्रत्येक अंग ब्रह्म है, अत: सर्वत्र रस का बोध बना रहना चाहिए। कर्म भी ब्रह्म का व्यावहारिक रूप है, अत: कर्म का भी प्रत्येक अंग रसमय हो। कर्म आनन्ददायक हो। कर्म का आनन्द ही पूर्ण मनोयोग है, भक्ति है। कर्म की इच्छा मन में उठती है। मन ईश्वर का मन्दिर है।

मन सूक्ष्मतर है। यह प्राण और वाक् के बिना नहीं रहता। प्राण सूक्ष्म तथा वाक् स्थूल है। सृष्टि में ये ही ऋक्-यजु: व साम हैं। यह वेदत्रयी अग्नि वेद है। कामना, तप और श्रमरूप तीन कर्मों से अग्निवेद से आप: बना। यही चौथा अथर्ववेद है। यजु: को द्विब्रह्म तथा अथर्व को षड्ब्रह्म कहा जाता है। षड्ब्रह्म रूप अथर्व में भृगु (अप्-वायु-सोम) तथा अंगिरा (अग्नि-यम-आदित्य) रहते हैं। इस प्रकार ऋक्-यत्-जू:-साम-अप्-वायु-सोम-अग्नि-यम-आदित्य की समष्टि को विराट् कहा जाता है। समस्त जगत के पदार्थों में ये दस तत्त्व विद्यमान रहते हैं। गीता में कृष्ण अपने विराट् रूप का दर्शन करवाते हुए अर्जुन से कहते हैं कि हे गुड़ाकेश! आज तुम मेरे शरीर में चर और अचर सहित सारे जगत को देखो और इसके अतिरिक्त भी तुम अपने मन में जो शंका धारण किए हुए हो, उसका उत्तर भी देख लो। तुमने ठीक ही कहा कि तुम अपने इन्हीं प्राकृतिक नेत्रों से मेरे ऐश्वर्य रूप को देखने में समर्थ नहीं हो सकोगे अत: मैं तुहें दिव्य चक्षु प्रदान करता हूं। उन चक्षुओं से मेरे ईश्वर संबंधी योग को देखो-

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।।

(गीता 11.7)

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम्।।

(गीता 11.8)

विराट् ही वेद है। ऋक्-साम का इन्द्र से सबन्ध है, यजु: का विष्णु से। यजु: के यत् रूप प्राणों में क्षोभ हुआ मन की कामना से। इससे वाक् (आकाश-जू) का प्रादुर्भाव होता है। पंचपर्वा विश्व में यह वाक् मन और प्राण से संबंधित होकर व्याप्त रहता है। पांचों पर्वों में उसका स्वरूप भिन्न-भिन्न रहता है। स्वयंभू के मूल तत्त्व ऋक्-यजु: (यत्-जू) व साम हैं, अत: इस लोक की वाक् को सत्यावाक् या वेदवाक् कहते हैं। परमेष्ठी अभस् (आप:) लोक है अत: यहां विवत वाक् आभ्रणी कहलाती है। सूर्य का छन्द बृहती है और यह पृथ्वी व चन्द्रमा की अपेक्षा बडे़ साम वाला है, अत: यहां बृहती वाक् है। चन्द्रमा की वाक् सुब्रह्मण्या कही जाती है क्योंकि चन्द्रमा सोमलोक है। सोम को ही सुब्रह्म भी कहा जाता है। पृथ्वी की वाक् को अनुष्टुप् कहा जाता है। क्योंकि पृथ्वी अग्निलोक है और इसका छन्द अनुष्टुप् है।

विज्ञान कहता है कि रसमय सृष्टि में केवल दो ही तत्त्व हैं—पदार्थ और ऊर्जा। यही हमारे लिए प्रकृति एवं पुरुष हैं, ब्रह्म और माया हैं। ब्रह्म ज्ञान है, भौतिक शास्त्र है, प्रकृति यज्ञशास्त्र है, रसायन शास्त्र है। ब्रह्म अग्नि है, प्रकृति सोम है—सौया है। अग्नि में सोमाहुति ही प्रजोत्पत्ति का कारण है। अग्नि पुरुष का स्वरूप है किन्तु वह शोणित में (स्त्री के) रहता है। सोम स्त्री का स्वरूप है किन्तु वह पुरुष के शुक्र में रहता है। यजु: रूप अग्नि आधार बनता है—द्विब्रह्म है। आपोरूप सोम आधेय बनता है। आप: षड्ब्रह्म है। यजु:रूपा योनि, स्थिति-गत्यात्मक, में मातरिश्वा वायु द्वारा रेतोरूप षड्ब्रह्म की आहुति होती है। एक नए स्वरूप का प्रादुर्भाव होता है, जिसे ‘महान्’ कहते हैं। अव्यक्त तत्त्व का यही महान् व्यक्त भाव है।

अग्नि में सोम की आहुति से दो प्रकार की सृष्टि होती है। एक स्नेह-संकोचमयी सृष्टि, जो घनता युक्त पदार्थ सृष्टि होती है। इसकी प्रथम कृति षोडशी पुरुष में अभिव्यक्त होती है। अथर्वा रूप क्षारीय भृगु से दूसरी आग्नेय सृष्टि होती है। इसमें भृगु-अंगिरा तत्त्व साथ रहते हैं। इनमें जिसकी यज्ञ में प्रधानता रहती है, वैसी ही सृष्टि होती है। वैसे अग्नि में सोम की तीन स्थितियों (आप:, वायु, सोम) से सृष्टि भी आप्य, वायव्य और सौम्य होती है। स्वयंभू की सृष्टि मौलिक है। परमेष्ठी याज्ञिक सृष्टि का मूल है। पुरुष यजु: है, यत् एवं जू: है। प्रसारधर्मा-आग्नेय है। सुब्रह्म सौम्य है—अथर्वा है, स्नेहनधर्मा है। परमेष्ठी का अप् ही सुब्रह्म है। अप् का अग्नि में योग या सोम का वायु द्वारा अग्नि में आधान ही सृष्टिकारक यज्ञ होता है। परमेष्ठी के भृगु व अंगिरा से क्रमश: लक्ष्मी व सरस्वती वाक् प्रादुर्भूत होते हैं। ये ही अर्थ वाक् और शब्दवाक् कहलाते हैं।

सृष्टि का आधार अव्यय की अविद्या/कर्म कलाएं होती हैं, इनमें प्राणकला और वाक्कला ही निर्माण का आधार बनती हैं। प्राण कला से अक्षर-प्राण सृष्टि तथा वाक् से पदार्थ सृष्टि होती है। वाक् व्यापक है, शान्त है, एक है। शब्द व्याप्य है, विविध भावों से उत्पन्न होने वाले हैं। शब्द की उत्पत्ति का कारण वाक् है। सृष्टि में कोई स्थान वाक् से रिक्त नहीं है। यही वाक् की व्यापकता है। वाक् में आघात लगने से तरंगें उठकर कान तक पहुंचती हैं तथा कर्ण विवर पर धक्का मारती हैं। इस आघात से ''संयोग-विभाग-शब्देभ्य: शब्दोत्पत्ति:’’ के अनुसार शब्द पैदा हो जाता है। ''शपं-आक्रोशं-ददाति’’ यही शब्द की उत्पत्ति है। शब्द धक्का देता है। वाक् शान्त है। शब्द बिना वाक् के रह भी नहीं सकता। वाक् और शब्द ही दाम्पत्य भाव में वृषा एवं योषा हैं। वाक् को अमृतवाक् तथा शब्द का मत्र्यावाक् कहा जाता है। वाक् इन्द्र तथा शब्द इन्द्रपत्नी कहलाते हैं। संसार में प्रधानता मत्र्यभाग की ही है। शब्द तन्मात्रा (आकाश का गुण) ही सृष्टि मूल है।

वेद वाक् से परात्पर-अव्यय-अक्षर-क्षर पुरुष का रूप षोडशी पुरुष बनता है। विश्व की प्रत्येक वाक् स्वरूप के केन्द्र में षोडशी पुरुष रहता है। शब्द वाक् की अधिष्ठात्री सरस्वती है तथा अर्थवाक् की अधिष्ठात्री लक्ष्मी है। शब्द वाक् में परा-पश्यन्ति-मध्यमा-वैखरी—चार भेद रहते हैं। अर्थवाक् अन्न है, भोगने की वस्तु होती है। सोम निर्मित होती है। लक्ष्मी-सरस्वती मूल में दो नहीं हैं। अर्थ और शब्द साथ ही रहते हैं। सच तो यह है कि उत्पन्न भी साथ ही होते हैं। अर्थ के साथ आकृति भी है और शब्द भी उसी का रूप बताता है। जैसे हाथी अर्थ है, हाथी शब्द भी है।

हमारी स्थूल सृष्टि अन्न से होती है। जीवात्मा का यात्रा मार्ग अन्न ही है अत: अन्न को ब्रह्म कहा जाता है। दूसरी ओर शब्द भी परावाक् से निकलता है। शब्द भी ब्रह्म है। जीवन की विचित्रता देखिए! अन्न ग्रहण का माध्यम रसना है और वाक् विसर्जन का माध्यम भी जिह्वा ही है। ब्रह्म ही अन्न रूप अर्थवाक् के रूप में शरीर में प्रवेश करता है और शब्दवाक् रूप में जीवन का संचालन करता है। शब्दों में निहित मंत्रशक्ति से भी लक्ष्मी को उत्पन्न किया जा सकता है। श्राप और वरदान रूप दिव्य कार्य किए जा सकते हैं। जैसे पुरुष में स्त्री एवं स्त्री में पुरुष रहता है, वैसे ही लक्ष्मी और सरस्वती में भी अविनाभाव हैं। जिह्वा मुख्य द्वार है इनका।

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क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com