
शरीर ही ब्रह्माण्ड : वर्ण, अन्न और मन
गुलाब कोठारी, (प्रधान संपादक,पत्रिका समूह)
प्रत्येक कर्म में ज्ञान की प्रथम अवस्था है। विभिन्न कर्मों का ज्ञान ही प्रवृत्ति का कारण होता है। ज्ञानबल के उपासक को ब्राह्मण, क्षत्रबल के उपासक को क्षत्रिय कहा जाता है। अर्थशक्ति के उपासक को वैश्य कहते हैं। ब्रह्म-क्षत्र-विट् तीनों ही प्रकृतिसिद्ध नित्य वीर्य हैं। (वीर्य शब्द शुक्र एवं रेत दोनों से भिन्न है।)
चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।
गीता 4.13
अर्थात्-चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभाग मेरे द्वारा रचे गए हैं। इनका कर्ता होने पर भी अकर्ता ही हूं।
गीता का यह श्लोक सृष्टि प्रक्रिया का आधारभूत मंत्र है, सिद्धान्त है। यह सम्पूर्ण व्यवस्था चलाने का आधारभूत संकेत दे रहा है। यह एक प्राकृतिक सिद्धान्त है, जो जड़-चेतन सम्पूर्ण सृष्टि पर समान रूप से लागू होता है। गीता में ही सर्वाधिक व्यवहार का निरूपण त्रिगुण-सत्त्व, रजस्, तमस् रूप में किया गया है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है। अव्यय पुरुष (कृष्ण) ही परा और अपरा प्रकृति के अधिष्ठाता हैं। मन-बुद्धि-अहंकार तथा पांच महाभूत अपरा प्रकृति हैं तथा अक्षर सृष्टि परा प्रकृति है। परा प्रकृति जगत को धारण किए रहती है। प्रकृति के अनुरूप ही आकृति और अहंकृति होती है। प्रकृति स्वभाव को कहते हैं। यह स्वभाव बीज में रहता है। अत: न केवल हमारा स्वभाव त्रिगुणी होता है, बल्कि हमारे सम्पूर्ण कार्यकलाप भी त्रिगुणी हो जाते हैं। यज्ञ, दान, तप, त्याग, कर्ता, कर्म, ज्ञान, अन्न, बुद्धि, मन, धृति आदि सभी कुछ त्रिगुण से आवरित रहते हैं। कृष्ण तो यहां तक कह गए कि-''त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन''। क्योंकि इन तीनों गुणों के कारण ही मन चंचल रहता है, स्थिर नहीं हो पाता, ''असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्'' (6.35)। अत: गीता ने पुरुषार्थ चतुष्टय के अनुरूप विभिन्न योगों के अभ्यास की चर्चा की है। इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता के पहले ये योग प्रचलन में नहीं थे। अवश्य थे। कृष्ण ने इन तीनों-कर्म, ज्ञान तथा भक्ति योगों को बुद्धि योग से जोड़कर चौथा वैराग्य बुद्धियोग जोड़ दिया। (जो कि गीता की अपूर्व देन है।)
प्रकृति की तरह वर्ण व्यवस्था भी प्रकृतिसिद्ध ही है। प्रकृति के सभी जड़-चेतन वर्ग वर्ण (चातुर्वर्ण) व्यवस्था में ही पिरोये गए हैं। मनुष्य, पशु-पक्षी-देव-गंधर्व-लता-वृक्ष-पाषाण आदि सभी इस व्यवस्था के अंग हैं। गीता भी इन वर्णों के स्वरूप की व्याख्या कर रही है-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।। 18.41
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।18.47
अर्थात्-चारों वर्णों के कर्म, स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किए गए हैं।
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरों के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत किए हुए धर्म से (कर्म से) व्यक्ति पाप को प्राप्त नहीं होता।
जीवन के दो ही मूल स्वरूप हैं-ब्रह्म (ज्ञान) तथा कर्म। ज्ञान मनोबल है, कर्म प्राणबल है। प्राण आपोमय (सोम) है, बुद्धि सौरी (सूर्य से अनुप्राणित) है। वरुण प्राण क्षत्र है, विज्ञानमय सूर्य मित्र है। ब्रह्म-क्षत्र के योग से विश्व उत्पन्न होता है, जो तीसरा वाग्बल है। अत: मन (ब्रह्म), प्राण (क्षत्र) तथा वाक् (विड्) की समष्टि ही ''इदं सर्वम्'' है। यदि ब्रह्म-क्षत्र का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो वह प्रलयकाल होगा।
ज्ञान व्यापक है, मूल है। लय अवस्था में कर्म नहीं रहता, तब भी ज्ञान रहता है। ब्रह्म ही क्षत्र की योनि है। प्रत्येक कर्म में ज्ञान की प्रथम अवस्था है। विभिन्न कर्मों का ज्ञान ही प्रवृत्ति का कारण होता है। ज्ञानबल के उपासक को ब्राह्मण, क्षत्रबल के उपासक को क्षत्रिय कहा जाता है। अर्थशक्ति के उपासक को वैश्य कहते हैं। ब्रह्म-क्षत्र-विट् तीनों ही प्रकृतिसिद्ध नित्य वीर्य हैं। (वीर्य शब्द शुक्र एवं रेत दोनों से भिन्न है।)
मानव का मन चन्द्र प्रधान है। रजोगुणी है। महद् लोक के प्रकृति भाव से युक्त है। चन्द्रमा के देवप्राण से ही हमारे प्रकृति मूलक 'वर्ण' का विकास होता है। वर्ण जन्ममूला होते हैं-कर्ममूला नहीं होते। आत्मा के साथ कर्म का क्षेत्र वर्ण के रूप में ही आता है। सत्त्व-रजस्-तमस् ही आत्मा के तीन वर्ण ब्रह्म-क्षत्र-विड् रूप में बीज के अंग हो जाते हैं। अब यह जीव किसी भी योनि में जाए, इसका वर्ण सूक्ष्म शरीर में साथ ही रहेगा। चूंकि वर्ण का प्रभाव रेत एवं शुक्र में रहता है, अत: जीव की प्रकृति में ही वर्ण का प्रभाव अभिव्यक्त होता है। इसी को वीर्य कहा जाता है। यही व्यक्ति के कार्य क्षेत्र (झुकाव) को परिलक्षित करता है। वीर्य ही वर्ण का आधार है। तीनों वर्ण ही ज्ञान-क्रिया-अर्थ रूप में मत्र्यसृष्टि का संचालन करते हैं। मृत्युलोक में जीव का स्वरूप भी वैश्वानर (अर्थ), तैजस (क्रिया) तथा प्राज्ञ (ज्ञान) रूप में ही होता है। यही ईश्वर- अंश होता है। ज्ञान ही इच्छा और कर्म का आधार होता है। ज्ञान उपार्जित नहीं किया जाता । यह प्रकृति अथवा अविद्या से ढका रहता है।
हमारे यहां कहावत है-जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन। गीता तीनों गुणों के अनुरूप- अन्न की विवेचना करती है। किस प्रकार की प्रकृति का प्राणी किस प्रकार के अन्न में रुचि रखता है। किन्तु अन्न जिस प्रकार की भौगोलिक पृष्ठभूमि में पैदा होता है, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अन्न में स्थानीय तत्वों का प्रभाव रहता है, जो खाने वाले के शरीर का निर्माण भी करता है। मां के शरीर में सन्तान के शरीर का पोषण भी करता है। अत: अन्न और शरीर का एक निश्चित सम्बन्ध रहता है। स्थानीय पंचमहाभूतों से ही व्यक्ति के शरीर का निर्माण होता है। अत: स्थानीय अन्न ही उचित माध्यम है स्वास्थ्य का। आज तो कई आहार-विशेषज्ञ कहने लगे हैं कि जो कुछ आपके क्षेत्र में पैदा होता है -अन्न-फलादि- वही उपयोग में लेना चाहिए। जबकि जीवन शैली आज विपरीत दिशा में ले जा रही है। बाहरी व्यंजनों पर अधिक जोर दिया जा रहा है। प्रभाव भी स्पष्ट हैं।
व्यापक रूप में हम देखें कि भूमण्डल का पूर्वी अद्र्ध भाग उष्ण प्रदेश है। हम इसको इन्द्र का प्रदेश कहते हैं। भूपिण्ड का पश्चिमाद्र्ध शीत प्रदेश है-वारुणी क्षेत्र है। पूर्व अग्नि है, पश्चिम सेाम है। अग्नि पुरुष रूप सत्य है। सोम स्त्रैण रूप ऋत है। अग्नि केन्द्र है, सोम परिधि है-पदार्थ है। अग्नि ऊर्जा है। दोनों क्षेत्रों के अन्न स्वरूप से समान नहीं हो सकते। अत: इन क्षेत्रों के प्राणियों का शरीर भी समान नहीं हो सकता। पूर्व का प्राणी पश्चिम में उपजा अन्न नियमित खाएगा तो रोगी हो जाएगा। यही स्थिति पश्चिम के प्राणी की पूर्व के अन्न से होगी।
अन्न भी तीन प्रकार के गुणों से युक्त तथा भोक्ता भी तीनों गुणों से प्रभावित। यह दूसरी विषमता का मार्ग है। किस प्रकार का शरीर, और किस प्रकार का अन्न। ब्राह्मण को सात्विक अन्न खाना चाहिए, क्षत्रिय को राजसी। ब्राह्मण का कार्य विद्यार्जन है, क्षत्रिय का प्रशासन और युद्ध कौशल। ब्राह्मण यदि राजसी अन्न खाता है, तो उसका मन आत्मा की ओर नहीं जाएगा। उसकी संरचना (शरीर की) वैसी हुई ही नहीं। इसी प्रकार, ब्राह्मण शरीर युद्ध कौशल में सफल नहीं होगा, इस विसंगति को दूर करने के लिए ''अन्नप्राशन'' संस्कार किया जाता है। इसमें आत्मा के स्वरूप की झलक मिल जाती है। जिस गुण की व्यक्ति में प्रधानता होती है, वही उसका वर्ण होता है। जन्म चाहे किसी परिवार में हो, वर्ण नितान्त प्राकृतिक व्यवस्था है। वैज्ञानिक भी है।
एक समय था जब समाज वर्ण शुद्धि पर आधारित था। व्यक्ति की शिक्षा, चर्या तथा अन्न पूर्णरूप में वर्णक्रम से मर्यादित थे। उनके प्रकृति के गुण एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक सुरक्षित थे। आज वर्ण संकर समाज बन चुका है। अन्न की व्यवस्था चरमरा गई है। अन्न विषाक्त भी हो गया है। अन्न का ब्रह्म स्वरूप लुप्तप्राय: हो चुका है। अब खानदान वर्ण के आधार पर नहीं खड़े रहते। भले हम वैश्य पुत्र को वैश्य कहें, अथवा ब्राह्मण पुत्र को ब्राह्मण। प्रकृति के तीनों गुणों की शुद्धता खतरे में है। तब एक वर्णविहीन समाज का निर्माण होने जा रहा है। वहां मर्यादा का बोझ नहीं है। स्वच्छन्दता ही मानवीय विकास है।
क्रमश:
Published on:
30 Oct 2021 09:30 am
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