
- गुलाब कोठारी, प्रधान संपादक, पत्रिका समूह
आत्मा अपने आप में कोई गुत्थी नहीं है। स्पष्ट न होने का कारण यही है कि हम शरीर का ही अस्तित्त्व मानकर जीते हैं, कर्म करते हैं। आत्मा को जानने के प्रश्न हमारे मन में उठते ही नहीं। हां, शास्त्रों को सुनते समय हम आत्मा का विवेचन भी सुनते हैं, किन्तु स्वयं से जोड़ नहीं पाते। अपने से भिन्न किसी वस्तु को आत्मा मान लेते हैं। हम सुनते हैं-'अहं ब्रह्मास्मि'। हम सुनते हैं-'ममैवांशो जीवलोके, जीवभूत: सनातन:।' किन्तु व्यवहार में हम शरीर और मन के बाहर नहीं जाते। अपने वातावरण में फंसे रहते हैं। जबकि सत्य यह है कि हम शरीर नहीं हैं, मन भी नहीं हैं। शरीर, मन, बुद्धि हमारे साधन हैं, नश्वर हैं। हम आत्मा के स्वरूप में शाश्वत हैं। अव्यय मन रूप है। जिसे हम मानते हैं, वह तो प्रतिबिम्ब है, मूल मन का। मूल मन आलम्बन है। असंग है, निर्लेप है, गुणातीत है और सदा साक्षी भाव में रहता है। अत: कर्ता भी नहीं हो सकता। व्यापक और पूर्ण है। जैसा कि अष्टावक्र गीता में कहा है कि आत्मा साक्षी है, व्यापक है, पूर्ण है, अकेला (अद्वितीय) है, मुक्त है, चैतन्य रूप है, अक्रिय है, संग रहित है, इच्छा रहित है, भ्रम के कारण सांसारिक की तरह लगता है।
'आत्मा साक्षी विभु: पूर्ण एकोमुक्तश्चिदक्रिय:।
असंगो निस्पृह: शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥' (१.१२ अ. गीता)
आत्मा में किसी भी प्रकार की इच्छा नहीं है, शान्त है। चैतन्य रूप है और सभी प्रकार की प्रक्रियाओं से परे है। फिर यदि सांसारिक स्वरूप वाला जान पड़ता है तो यह हमारा भ्रम है। क्योंकि जब मैं स्वयं ही ब्रह्म हूं तब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरा ही वितान यानी फैलाव है। मैं ही सृष्टि में व्याप्त हूं। फिर भी यदि भ्रमित हूं तो इसका कारण माया ही है। माया ने ही शरीर का निर्माण करके उसमें आसक्ति भर दी।
जहां गति-आगति-स्थिति रहते हैं। तीनों अक्षर प्राण-ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र कार्य करते हैं। स्वरूप की रक्षा करते हैं। कृष्ण ने आत्मा के स्वरूप को भी व्यापक अर्थ दिया है-
'न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा:।
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् ॥' (२.१२ गीता)
अर्थात् 'न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, अथवा तू नहीं था, ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।'
यहां कृष्ण ने आत्मा-परमात्मा के भेद को भी मिटा दिया। परमात्मा को अपने जन्म याद हैं, जीवात्मा/कर्मात्मा को माया के भ्रम के कारण याद नहीं है। ब्रह्म रस रूप में केन्द्र में गूढ़ात्मा है, माया उसकी अभिव्यक्ति रूप विश्व है। माया बल से ही ब्रह्म की उपस्थिति का ज्ञान होता है। माया के संकोच से ही तो परमात्मा आत्म-रूप बनता है। कृष्ण तो यह भी स्पष्ट कर गए कि मैं ही आत्मा बनकर जीवात्मा रूप धारण करता हूं-
'मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।' गीता १४.३
यहां 'मैं' हमारे लिए भी आत्मा का वाचक ही माना जाएगा। यही तो मेरा स्वयं के लिए सम्बोधन भी है और आत्मा का रूप भी है। आत्मा स्वयं में ज्ञान रूप है। अर्थात् जीवात्मा और ज्ञान भी पर्याय ही हैं, सत्य है। ज्ञान ही जीवात्मा का परिचय कराता है या बन जाता है। कुछ भी कार्य करने से पूर्व हम जान लेते हैं कि क्या मैं यह कार्य कर सकता हूं। यह भी जान पाता हूं कि परिणाम क्या निकलेगा। यह निष्कर्ष कौन निकालता है? किसको यह ज्ञान होता है? यही जीवात्मा है। यही 'मैं' भी हूं। यही सूत्रात्मा रूप में अग्नि-वायु-आदित्य को जोड़े रखता है। शरीर में यही वैश्वानर, तैजस, इन्द्र रूप (चेतना) कार्य करता है। अव्यय आत्मा रूप 'मैं' भी यही है। इसी में अक्षर और क्षर समाहित रहते हैं। इन्हीं तीनों को अमृतात्मा भी कहते हैं। कृष्ण स्वयं को सातों विभक्तियों में एक ही रूप में प्रयुक्त अव्यय के समान अव्यय पुरुष कहते हैं। अव्यय दिखाई भी नहीं देता और न शरीर के साथ नष्ट ही होता है।
कर्म करता तो पुरुष है, तब फल क्यों कोई दूसरा भोगे? दूसरा कौन है, जो भोग लेगा? और क्यों भोगने को तैयार होगा? सिद्धान्त तो यह भी है ईश्वर/जीव में कर्ता भाव नहीं है। कृष्ण अर्जुन को इसी बात को समझाते हुए कहते है कि
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। गीता 2.47
(अ) कर्म करने में ही तेरा अधिकार है। (ब) फलों में तेरा अधिकार नहीं है। (स) तू फलों का हेतु मत हो। (द) तू कर्म न करने में भी आसक्त मत हो।
कर्म ही तेरा अधिकार है। अत: कर्म न करने की सोच ही मत। एक ओर कह रहे हैं कि फल पर तेरा अधिकार ही नहीं। दूसरी ओर कह रहे हैं कि फलों के भोगने का हेतु पुरुष ही है।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।। गीता 13.20
कर्म और कर्म करने के साधन (उत्पन्न करने के) प्रकृति का व्यापार है, किन्तु फलों के भोगने का हेतु पुरुष है।
कर्म का हेतु है इच्छा और इच्छा का हेतु है माया। माया ईश्वर/जीव की शक्ति है। माया के कर्मों के फलों का भोग ईश्वर/जीव को करना होगा। कर्म करने की प्रेरणा होने पर प्राणों में गति होती है। प्राण प्रकृति के नहीं, पुरुष के नियंत्रण में रहते हैं। मन ही पुरुष है। मन की प्रकृति (स्वभाव-त्रिगुण) ही कर्म की दिशा तय करती है। बुद्धि उसी दिशा में कर्म करने का शरीर को आदेश देती है। कर्म प्रकृति का नहीं है, मन का है, पुरुष का है।
प्रकृति कर्म करने की इच्छा पैदा नहीं कर सकती। फल इच्छामय कर्म से आते हैं। निष्काम मन से फल नहीं आते। अत: प्रकृति का सम्बन्ध कर्म से होता ही नहीं है। वह कर्म को सत्कर्म या दुष्कर्म बना सकती है। परिणाम प्रभावित अवश्य कर देती है, किन्तु यह मन की इच्छा ही है।
यहां कह रहे हैं कि तू फलों का हेतु मत हो। यह भी तय है कि हर कर्म का फल भी अवश्य ही मिलता है। यही गीता का कार्य क्षेत्र है।
कृष्ण का इशारा उस स्थिति की ओर है जहां कर्म करना अनिवार्य है और फल प्राप्ति से बचा भी जा सकता है। तब प्रश्न उठता है कि कर्म किए ही क्यों जाए? मानव शरीर तो कर्म का ही पर्यायवाची है। कर्म की अधिष्ठात्री माया है। 'मम माया दूरत्यया' (गीता ७.१४) कह रहे हैं माया को। तुझे दोनों में से एक का चुनाव करना है। यही जीवन का मूल द्वन्द्व है। अर्जुन के मन में जो संशय उठा वह माया के कारण था। कृष्ण ने अपनी ओर खींचा तो संशय मिट गया। अर्जुन साधारण व्यक्ति नहीं था। उसका संशय दूर करने के लिए भी कृष्ण को कितनी शक्ति लगानी पड़ी। वैराग्य तथा योग तक ले गए। विभूतियों का झोला खोलकर उसके सामने रखा। काम नहीं बना। तब विराट रूप दिखाना पड़ा। साथ ही यह भी दुत्कार लगाई है कि तेरे बिना भी सारे योद्धा मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। तू चाहे तो यश कमा ले। बस, क्षत्रिय बनकर अपना कर्म कर। उठ!! कितना रहस्य छिपा है कर्म सिद्धान्त में। 'तू नहीं चाहेगा तो भी माया तुझसे कर्म कराएगी। तू क्षत्रिय है। तुझ से तेरा स्वभाव युद्ध करवाएगा।' क्या इसी को कर्म करने का अधिकार कहते हैं? यह तो लाचारी हुई! कर्म की इस सम्पूर्ण यात्रा में तुझे अपनी इस लाचारी से लडऩा है। माया से बस ब्रह्म ही लड़ सकता है। तब विजय पाने के लिए तुझे भी अपने ब्रह्म स्वरूप में आना पड़ेगा। अर्जुन के भीतर यदि कृष्ण हैं, तब तेरे भीतर भी हैं। ''अहं ब्रह्मास्मि'' या ''तत्वमसि'' तेरे लिए ही कहा गया है। यदि तूने माया से पार पा लिया, कृष्ण रूप तेरी पकड़ में आ गया, तो यह निश्चित हो जाएगा कि तूने गीता समझ ली।
क्रमश:
Published on:
26 Jun 2021 07:35 am
