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वित्तीय संकट के संकेत दिखा रहे बैंक आधारित प्रणाली की भंगुरता

बड़े बैंकों की विफलता फिलहाल प्रबंधन सीमाओं के दायरे में है, पर मंदी के संकेत दे रही है। इस समय केंद्रीय बैंक तुरंत ब्याज दरें नहीं घटा सकते क्योंकि महंगाई तेजी से बढ़ रही है। ऋण तुरंत खत्म नहीं किया जा सकता, जबकि जमाकर्ता तुरंत अपना पैसा मांग सकते हैं।

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Patrika Desk

Mar 27, 2023

वित्तीय संकट के संकेत दिखा रहे बैंक आधारित प्रणाली की भंगुरता

वित्तीय संकट के संकेत दिखा रहे बैंक आधारित प्रणाली की भंगुरता

डॉ. अजीत रानाडे
वरिष्ठ अर्थशास्त्री और विचारक
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नवंबर 2008 में लीमैन फर्म के दिवालिया होने के कुछ सप्ताह बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शीर्षस्थ शिक्षाविदों के साथ बैठक में महारानी ने सवाल पूछा था - बड़े पैमाने पर आई मंदी का दौर बहुत ‘बुरा’ था पर कोई इसे आता हुआ देख क्यों नहीं पाया? सभी बुद्धिमान, विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री सदी की इतनी बड़ी मंदी की आहट सुनने में विफल कैसे हो गए? इस सवाल पर वहां सन्नाटा पसर गया। इस सीधे-से सवाल का 15 साल बाद आज भी कोई जवाब नहीं मिल सका है। लोग संबंधित सिद्धांत और जवाब खोजने में लगे हैं, ताकि वित्तीय संकट के कारकों को समझा जा सके। यह भी संभव है कि जवाब सामने हो पर कोई कुछ बोलना नहीं चाहता।

महारानी के सवाल के जवाब में प्रख्यात ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने तीन पेज का जवाब तैयार किया। उन्होंने इसके लिए कई ‘प्रतिभाशाली लोगों की सामूहिक कल्पना की विफलता’ को दोष दिया। नोट में ‘इनकार के मनोविज्ञान’ की भी बात कही गई, जिसने सामने से आते हुए संकट को देखने के बावजूद वित्तीय व राजनीतिक जगत को जकड़े रखा। इसके लिए कई घटक जिम्मेदार थे, जैसे गलत सलाह, लेखा परीक्षकों द्वारा सतर्कता की अनदेखी, उच्च मानकों से रहित नियामक, अत्यधिक उधारी व शक्तियों का प्रयोग, बिना सम्पत्ति/आय वालों द्वारा ऋण लेना। पर सबसे बड़ा कारण रहा अक्खड़पन के साथ खयाली पुलाव पकाने की प्रवृत्ति।

सिटीबैंक के चेयरमैन ने तब बाजार में आई मंदी के दौर में कहा था कि 2008 से पहले के कुछ साल ऐसे थे ‘जबकि संगीत के बजते रहने तक आपको उठकर डांस करना ही पड़ता है’, यानी कि उनका बैंक लगातार जोखिमपूर्ण कर्ज दिए जा रहा था, यह जानते हुए भी कि यह बड़ी विपदा का कारण बनेगा। 2008 के संकट को देखते हुए मुख्यत: अमरीका के नेतृत्व में कई सरकारों ने ऐसे वित्तीय संकट को टालने में सहायक कड़े कानून पारित किए जो अत्यधिक कर्ज देने, शिथिल जोखिम प्रबंधन और अन्य गलत आदतों के कारण आ सकते हैं। अमरीका में इससे संबंधित प्रसिद्ध डॉड-फ्रैंक विधेयक पारित किया गया था। इसके बावजूद अब एक बार फिर हम नए वित्तीय संकट के गवाह बन रहे हैं। कैलिफोर्निया के सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) का डूबना इस बात का साक्षी है कि 2008 के बाद से प्रभावी किए गए विधिक सुरक्षा मानक अपर्याप्त रहे।

वित्तीय संकट बार-बार आते हैं और पिछले तीन दशकों में इनकी आवृत्ति बढ़ गई है। इनके ब्योरे अलग-अलग हैं। कुछ गंभीर हैं और कुछ नहीं। पर इनके कारण एक जैसे ही हैं। यह लालच और इससे उपजने वाले भय और फिर अफरा-तफरी के वातावरण और भेड़चाल का सम्मिश्रण है, जिसमें लेखा परीक्षकों या निरीक्षकों के गलत कार्य और नियामकों की शिथिलता भी शामिल है। कभी-कभी इस सम्मिश्रण के शीर्ष पर राजनीतिक दबाव होता है। डूबने से तीन महीने पहले ही एसवीबी को फोब्र्स ने अमरीका के 100 श्रेष्ठ बैंकों में से शीर्ष 20 में स्थान दिया था। केपीएमजी ने भी बैंक की सेहत को मजबूत करार दिया था। एसवीबी के पास करीब 200 अरब डॉलर की जमाराशि थी, जिसमें से 93 प्रतिशत फेडरल डिपोजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (एफडीआइसी) से बीमित नहीं थी। इन जमाओं का एक बड़ा हिस्सा ऋण के तौर पर नहीं दिया जाता बल्कि सरकार व अन्य ‘सुरक्षित’ बॉन्ड में निवेश किया जाता है। ब्याज दर बढऩे के साथ इन बॉन्ड की कीमत घटने लगती है। फेडरल रिजर्व लगातार दरें बढ़ा रहा है। इसके चलतेे बेंचमार्क दरें करीब 5 प्रतिशत पॉइंट बढ़ गई हैं। यानी बॉन्ड्स बेचने पर खरीद मूल्य से चौथाई कीमत भी नहीं वसूल पाएंगे। एसवीबी का जोखिम प्रबंधन इसका अनुमान लगाने में विफल क्यों रहा?

संकट के बारे में जानने पर जब जमाकर्ता अपना पैसा लेने बैंक के पास जाता है तो चुनिंदा शुरुआती लोगों को ही पैसा मिल पाता है। शेष लोगों को पता चलता है कि उनका सारा पैसा डूब गया है, सिवाय बीमित राशि के। एसवीबी के मामले में यह राशि कुल जमा की केवल 7 प्रतिशत थी। इसी डर से बैंक से पैसा निकालने के लिए भगदड़ मची और बैंक डूब गया। राजनीतिक दबाव के चलते अमरीकी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि हर जमाकर्ता को उसका पैसा वापस मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह सरकारी बेलआउट नहीं है, पर असल में यह जनता के पैसे से दिया जा रहा बेलआउट ही है। फेडरल रिजर्व बैंक जमाकर्ताओं का पैसा चुकाने के लिए एसवीबी को सस्ता ऋण देगा। एसवीबी के बाद सिग्नेचर बैंक बंद हुआ। स्विट्जरलैंड का सबसे बड़ा और वैश्विक उपस्थिति वाला बैंक क्रेडिट स्युइस भी दिवालिया होने को था। यूबीएस ने भारी छूट पर खरीद इसे बचाने की कोशिश की है पर दुनिया के बाजारों पर मंडरा रहा खतरा अभी टला नहीं है।

बड़े बैंकों की विफलता फिलहाल प्रबंधन सीमाओं के दायरे में है, पर मंदी के संकेत दे रही है। इस समय फेड और दूसरे केंद्रीय बैंक तुरंत ब्याज दरें नहीं घटा सकते क्योंकि महंगाई तेजी से बढ़ रही है। यह वित्तीय संकट हालांकि 2008 से छोटा है पर बैंक आधारित वित्तीय प्रणाली की भंगुरता को दर्शाता है। बैंक जनता के पैसों का इस्तेमाल ऋण देने के लिए करते हैं और विकास में सहायक होते हैं, पर ऋण लिया गया पैसा संपत्ति के रूप में होता है, जिसे तुरंत खत्म नहीं किया जा सकता। जबकि जमाकर्ता तुरंत अपना पैसा मांग सकते हैं। इस विसंगति की वजह बैंकों पर लोगों का विश्वास है। उन्हें भरोसा होता है कि बैंक जोखिमपूर्ण ऋण नहीं देंगे, अत्यधिक जोखिम नहीं लेंगे, लालच कभी विवेक पर हावी नहीं होगा।
दुर्भाग्य है कि अक्सर जनता और करदाताओं को ऐसी गड़बडिय़ों की कीमत चुकानी पड़ती है। लाभ निजी होते हैं और नुकसान समाजीकृत। ऐसा बार-बार होता रहा है।

(द बिलियन प्रेस)