
छलावा ही है एकल माताओं की सामाजिक स्वीकार्यता
ऋतु सारस्वत
समाजशास्त्री और स्तम्भकार
समाज मां के त्याग और समर्पण के प्रति कृतज्ञ नजर आता है, पर इससे परे भी एक सच 'एकल माताओं ' का है, जिनके प्रति समाज असहिष्णु है। सहज विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता कि समाज की यह स्थिति है। मन को संतोष देने के लिए यह विश्वास कर लिया जाए है कि यकीनन ऐसी सोच पिछड़े हुए या विकासशील देशों एवं ग्रामीण अंचलों की होगी, परंतु यह विश्वास भ्रम से अधिक कुछ नहीं है। एकल माताओं को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता वास्तविकता में दिखावे से अधिक कुछ नहीं है। हालत यह है कि महानगरों से लेकर कस्बों तक उन्हें किराए पर मकान दिए नहीं जाते और अगर दिए भी जाते हैं, तो प्रश्नों और शर्तों का मकडज़ाल ऐसा बुना जाता है कि उनका स्वाभिमान आहत होता है। इन्हीं परेशानियों के चलते महाराष्ट्र की सिंगल वीमेन सोसाइटी 19 हजार महिलाओं का संगठन बनाकर बिना किसी गारंटर के एकल माताओं के लिए घर खरीदने के लिए कर्ज दे रही है।
दुनिया के किसी भी कोने में बच्चों के लिए आदर्श स्थिति वह होती है, जहां उन्हें माता-पिता दोनों का ही प्यार और संरक्षण मिले, परंतु संबंधों के टकराव और अहं की लड़ाई के बीच जब कभी किसी दंपती के संबंध विच्छेद हो जाते हैं, तो बच्चों का संपूर्ण दायित्व अमूमन मां के हिस्से आता है। ऐसा नहीं है कि पिता बच्चों के उत्तरदायित्व से परहेज करते हैं, परंतु चूंकि मां को नैसर्गिक रूप से पालनकर्ता स्वीकार किया जाता रहा है, इसलिए न्यायालय अधिकांशत: बच्चों का दायित्व मां को ही सौंपता है। यह सच है कि भारत ही नहीं, विश्व के कई देशों में एकल पिताओं की संख्या में इजाफा हुआ है, परंतु इस सच के साथ एक सच और भी है। जहां एकल माताओं के प्रति समाज का दृष्टिकोण बहुत कठोर है, वहीं एकल पिताओं के प्रति उदार। इस भेदभाव की लकीर इतनी गहरी है कि एकल माताओं का जीवन सदैव कठघरे में खड़ा रहता है, जहां उन्हें हर क्षण यह सिद्ध करना होता है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं। सर्वश्रेष्ठता का प्रमाण समाज को देते-देते वे शारीरिक और मानसिक रूप से टूटने लगती हैं। 'जनरल ऑफ फेमिनिस्ट फैमिली थेरेपीÓ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक एक पिता जब अपने बच्चों का दायित्व अकेले निभाने का निर्णय लेता है, तो वह उसकी महानता होती है, वहीं इसके विपरीत महिला का प्रथम और मौलिक दायित्व बच्चे का पालन-पोषण माना जाता है। अध्ययन यह भी बताता है कि एकल माताओं का संपूर्ण व्यक्तित्व हर समय कसौटी पर होता है। वहीं एकल पिता को ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया जाता है, जो मुश्किल हालात के बीच तमाम दायित्वों के मध्य संतुलन बैठाता हुआ अपने बच्चों का पालन करता है।
बोरिस जॉनसन 1995 में 'द स्पेक्टेटर मैगजीन' में एकल मांओं की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी की आलोचना करते हुए एकल माताओं के बच्चों को अज्ञानी, आक्रामक और अवैध के रूप में वर्णित किया था, जो बहुत आपत्तिजनक था। ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उनसे इस टिप्पणी पर प्रश्न पूछा गया, तो उनका कहना था उनका यह विचार राजनीति में आने से पूर्व का था। वास्तविकता यही है कि व्यापक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संरचनाएं एक ऐसे ढांचे का निर्माण करती हैं, जहां एकल माताओं को संशय से देखा जाता है। शेरोंन हेज ने अपनी पुस्तक 'द कल्चरल कांट्रडिक्शन ऑफ मदरहुड ' में लिखा कि समाज एकल माताओं से अपना करियर, स्वास्थ्य सभी को तिलांजलि देते हुए सिर्फ अच्छी मां बनने की अपेक्षा करता है। यानी वे अपना पूरा समय, ऊर्जा और जीवन अपने बच्चों की परवरिश को दें, पर क्या ऐसा करना उचित है?
Published on:
10 May 2022 08:28 pm
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