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प्रसंगवश: कुंठित मानसिकता वालों से सख्ती से निपटना होगा

छेड़छाड़ की घटनाओं को पुलिसतंत्र व समाज हल्के में लेने लगे तो ऐसी अनदेखी का नतीजा घातक होता है

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Patrika Desk

Jun 07, 2022

प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

महिलाओं के मान-सम्मान के साथ खुलेआम खिलवाड़ करने की शर्मनाक व बेहूदा हरकत करने वाले युवक का वीडियो बनाकर पुलिस तक पहुंचाने वाली छात्राओं की बहादुरी प्रशंसनीय है। लेकिन विडम्बना यह कि छात्राओं के वीडियो बनाकर थाने पर जाने के बाद भी पुलिस एक्शन में नहीं आई। इंतजार करती रही कि कोई आकर प्राथमिकी दर्ज कराएगा। बालिकाओं की इज्जत-आबरू से खिलवाड़ करने की जुर्रत करता हुआ कोई अपराधी खुलेआम आपत्तिजनक और अश्लील हरकतें कर रहा हो और पुलिस इसके लिए किसी शिकायतकर्ता की तलाश करती फिरे, इससे ज्यादा निंदाजनक और क्या हो सकता है? क्या आमजन को सुरक्षित माहौल मिले, यह देखना पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है? क्या इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये से पुलिस की छवि दागदार नहीं होगी? बड़ी चिंता यह है कि बेटियों की इज्जत से खेलने वाली घटनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं।

एक सर्वे में 70 फीसदी युवतियों ने खुद के छेड़छाड़ की शिकार होने की बात कबूली है। इनमें से ज्यादातर इसका समुचित विरोध भी नहीं कर पातीं। इसलिए समाजकंटकों का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। बालिकाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। घर हो या बाहर, बस में हों या सड़क पर, हर जगह युवतियों-महिलाओं का पीछा कर फब्तियां कसना और उन्हें परेशान करना बहुत ही आम बात हो गई है। आए दिन ऐसी घटनाएं होते रहने पर भी समाज या पुलिसतंत्र इसे बहुत हल्के में लेता है। इस अनदेखी का नतीजा ही कई बार घातक होता है। अपराधी प्रवृत्ति के लोगों का दुस्साहस बढ़ता जाता है और बड़े अपराधों की जमीन तैयार करता है। सर्वे बताता है कि स्कूल-कॉलेज के बाहर छेड़छाड़ की सर्वाधिक घटनाएं सामने आती हैं। इसके बावजूद वहां सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। प्राथमिकी दर्ज करवाने के बजाए पीडि़त पक्ष इसे एक हादसा मानकर नजरअंदाज करने में ही भलाई समझता है। अगर मात्र 6 फीसदी बेटियां ही पुलिस या निर्भया स्क्वाड को फोन कर अपने साथ हुई घटना की शिकायत करने का हौसला कर पा रही हैं तो साबित होता है कि बहुत बड़े वर्ग को पुलिस की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं है, इसलिए चुप्पी धारण कर लेते हैं। इस कुंठित मानसिकता और असभ्य बर्ताव के खिलाफ बेटियों को ही अब चुप्पी तोड़नी होगी। समाज में ही पनप रहे ऐसे नासूरों पर भी निगाह रखनी होगी ताकि ऐसी घटनाएं फिर न हों। (र.श.)