व्यंग्य राही की कलम से
पहले तो समझते थे हम अकेले ही हैं जो 'सुबह त्यागी, शाम भोगी' का जीवन जी रहे हैं। लेकिन अब समझ आया कि हम तो बड़े-बड़े गुरुघंटालों के सामने कुछ भी नहीं। पिछले दिनों नेताजी की सीडी बाजार में आई। बेचारे ब्रह्मकालीन बेला में सुबह उठते ही अपनी पत्नी के पांव छूते थे। कसम से ऐसा त्यागी हमने आज तक नहीं देखा। लेकिन सांझ ढलते-ढलते परमभोगी बन जाते थे।
जानकार कह रहे हैं कि वे स्वयं ही अपनी लघु फिल्में बनाते थे और उन्हें अमरीका भेजते थे। लेकिन दिलजलों को न उनका त्याग पसन्द आया न भोग। पकड़े गए। अपने समाज में लाखों ऐसे हैं जो सांझ को पीते हैं और सुबह उठते ही 'तौबा' करते हैं। कुछ 'मंगलवार' को त्यागी हो जाते हैं। कुछ सावन के महीने में 'त्यागी' की भूमिका अपना लेते हैं। असल में 'भोग' का त्याग करना अच्छे अच्छों के वश की बात नहीं। 'मन' और 'तन' बस में होता तो संत का चोला ओढऩे वाले अभी तक सींखचों के भीतर न होते। त्याग के बारे में जोगी भरथरी की अद्भुत कथा है। राजा भर्तृहरि राजपाट छोड़ कर जोगी बन गए तो एक दिन राह में एक हीरा पड़ा देखा। रुक गए। तभी दो घुड़सवार वहां आए।
उन्होंने भी हीरा देखा और उसके स्वामित्व को लेकर भिड़ गए। तलवारें चल गईं। इस युद्ध में दोनों मर गए। भर्तृहरि को हंसी आ गई। उनके ऊपर नहीं स्वयं पर। सोचने लगे अपने खजाने में इस जैसे हजारों हीरे छोड़ आया फिर भी इसे देख कर रुक गया। मैं कैसा त्यागी हूं।
हमारे नेता समाज सेवा के लिए त्याग की बातें करते हैं और कुर्सी पर बैठते ही 'संचय' में जुट जाते हैं। वे भी अन्ना के संग त्यागी थे लेकिन अब भोगियों से घिरे नजर आ रहे हैं। समझ नहीं पा रहे कि करें तो करें क्या। साथी भी एक से एक जोरदार- कोई शराबी, कोई भोगी, कोई बड़बोला, कोई रिश्वती वाह क्या 'त्यागियों' की फौज है जिसमें एक से बढ़कर एक भोगी है। बस वे ही एक सज्जन लग रहे हैं।