
- गुलाब कोठारी
हमारी सृष्टि का आधार है पुरुष और प्रकृति। यह मूल में ब्रह्म और माया का विकसित स्वरूप ही है। सृष्टि है पुरुष की और कर्ता है माया। प्रकृति उसे दिशा देती है। पुरुष को रस तथा माया को बल कहा जाता है। सृष्टि में जो कुछ दिखाई देता है, वह ब्रह्म का विवर्त ही है। इसमें से माया भाव के हटते ही फिर से पुरुष भाव ब्रह्म में लीन हो जाता है। यही कारण है कि सृष्टि को पुरुष प्रधान कहते हैं। इसका एक वैज्ञानिक आधार भी है। सृष्टि को अग्रि-सोमात्मक भी कहा है। इसमें पुरुष अग्रि रूप तथा स्त्री सोम रूप है। सोम और अग्रि का सम्बन्ध एकपक्षीय होता है। सोम-अग्रि में आहूत होता है, तब नया निर्माण होता है। इसके साथ ही सोम का अस्तित्व गौण रहता है। यह भी पुरुष प्रधान सृष्टि का आधार है। इसलिए ही पुरुष की भोक्ता संज्ञा है। जब भी अग्रि-सोम अथवा रस-बल से सृष्टि होती है; इसमें यदि रस की प्रधानता हो तो उसे मन-प्राण-वाक् कहते हैं। बल अथवा प्रकृति प्रधान हो तो सत-रज-तम कहते हैं। ब्रह्म का पहला विवर्त अव्यय पुरुष का होता है। इसमें माया भाव को महान या महत्त्व कहा जाता है। यह अव्यय पुरुष की प्रकृति है। अक्षर पुरुष की प्रकृति को अहंकार कहते हैं। अक्षर से पंचात्मक क्षर तथा अहंकार से पंच तन्मात्राएं बनती हैं। इस प्रकृति के तीनों गुणों से बुद्धि का निर्माण होता है। यही बुद्धि पुरुष को बांधती है।
सत्वगुण प्रकाश रूप, रजोगुण प्रवृत्ति कारक तथा तमोगुण आवरक है। रजोगुण क्रिया वाचक है। इसको उपष्टंभक (जो दूसरों को चलाए) भी कहते हैं। चलं च रज:। इसी प्रकार मन-प्राण-वाक् में भी प्राण क्रिया वाचक है। सत और तम निश्चल है। मन और वाक् भी निश्चल है। क्रिया शून्य है। जब प्रकृति में पुरुष के प्रतिबिम्ब के विकास का अध्ययन करना हो, तब पता लगेगा कि सृष्टि की पूर्वावस्था में सर्वत्र तमोगुण व्याप्त था। विक्षोभ के द्वारा तमोगुण का आवरण भंग हुआ। विक्षोभ त्रिगुणात्मक प्रकृति का स्वभाव ही है। जब तीनों गुण अपने ही रूपों में परिणत होते रहते हैं, उनको ‘स्वाप’ कहा जाता है। जब तीनों गुणों की एक-दूसरे में व्याप्ति होती रहती है, तब उसे ‘जागरण’ कहते हैं। यही स्वभाव है। यही विक्षोभ है।
ब्रह्म की सृष्टि निर्माण की इच्छा इस विक्षोभ की जनक है। यह इच्छा माया की है। बुद्धि की वृत्ति नहीं है। बुद्धि तो बाद में उत्पन्न होती है। ब्रह्म की स्वातन्त्र्य नाम की एक शक्ति है। यह इच्छा उस शक्ति की वृत्ति है। इस शक्ति का विकास ही सृष्टि का छाया रूप माना गया है। ब्रह्म बीज रूप है, माया धरती है। बीज का ग्रहण, आवरण, पोषण तथा नए निर्माण की पीड़ा सभी कुछ इसके खाते में होता है। स्वयं के विकास को यथावत् रखना उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। ब्रह्म के मन में इच्छा उठती है कुछ बनने की। इच्छा बीज है, इसके विकास की सारी संभावनाएं माया के हाथ है। वही स्वरूप का निर्माण करती है। ब्रह्म केन्द्र में रहता है। पुरुष को नए निर्माण की पीड़ा कम नहीं झेलनी पड़ती। हर बार जन्म से पूर्व पेट में बन्द रहना पड़ता है। चौरासी लाख योनियों में भटकता है। कितना काल इस कोठरी में कटता होगा। कितने आवरणों का बोझ उठाकर जीना पड़ता है। हर जन्म में वही मां हो यह जरूरी नहीं।
ब्रह्म चूंकि स्वयंभू लोक से जुड़ा रहता है, अत: उसका स्वरूप ऋषि प्राणों के द्वारा आगे गति करता है। परमेष्ठी लोक में पितृ प्राण से मिलकर अव्यय पुरुष रूप बिन्दु भाव की प्रथम सृष्टि का निर्माण होता है। इसी के आगे अक्षर पुरुष अथवा देह प्राणों के संसार की उत्पत्ति होती है। सूर्य इस देव सृष्टि का इन्द्र राजा है। चूंकि हमारे अधिभूत, अधिदेव तथा अध्यात्म का निर्माण ऋषि, पितृ, देव प्राणों से होता है, अत: ये तीन ही जीवन के ऋण कहलाते हैं।
सूर्य के आगे क्षर सृष्टि उत्पन्न होती है। हर सृष्टि का बीज यहीं से चलता है। अत: सूर्य को ही जगत का पिता कहा गया है। माया यहां प्रकृति रूप में रहती है। क्षर पुरुष से माया रूप पांच तन्मात्राएं (नाद, स्पर्श, तेज, रस तथा गंध) और ब्रह्म रूप पांच महाभूत (आकाश, वायु, अग्रि, जल और पृथ्वी) बनते हैं। सारी दृश्य सृष्टि इनके आगे चलती है। अक्षर सृष्टि में प्रकृति के कारण देव के साथ असुर प्राण भी होते हैं। अन्तरिक्ष में गंधर्व प्राण एवं पशु प्राणों का क्षेत्र पृथ्वी है। पृथ्वी तक वैश्वानर अग्रि का निवास है। यह सूर्य एवं पृथ्वी के अग्रि का मिश्रण है। पृथ्वी के आठ वसु, अन्तरिक्ष के ग्यारह रुद्र और द्यु लोक के बारह आदित्य, दो अश्विनी कुमार ; इस प्रकार तैतीस देवता कहलाते हैं और प्राण रूप कार्य करते हैं। इस प्रकार स्थूल रूप तक पहुंचते-पहुंचते ब्रह्म के ऊपर माया-महामाया-अहंकार-प्रकृति के अनेक आवरण चढ़ जाते हैं। जो कुछ दिखाई देता है वह इन आवरणों से छनकर आने वाला प्रतिबिम्ब ही है। इसको समझने के लिए व्यवहार रूप में पंचकोष के सिद्धान्त का सहारा लिया जाता है। ब्रह्म के चारों ओर यह पांच आवरण व्यवस्थित रूप में कार्य करते हैं। शरीर को अन्नमय कोष कहते हैं, भीतर क्रमश: प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोष रहते हैं। भीतर पहुंचने के लिए शरीर से शुरू होकर सारे कोष पार करने पड़ते हैं। तब हम पुरुष-अव्यय पुरुष रूप कृष्ण तक पहुंचते हैं। ये पांच कोष ही अव्यय की 5 कलाएं हैं।
अव्यय की पांच कलाओं से आगे अक्षर सृष्टि होती है। मन जैसे ही सृष्टि की ओर अग्रसित होता है, आनन्द और विज्ञान मन के भीतर गर्भित हो जाते हैं। इच्छा के अनुरूप मन ही प्राण रूप ग्रहण करता है। प्राण से ही प्राणों की अक्षर सृष्टि होती है। अक्षर सूक्ष्म सृष्टि भी है और आगे की क्षर सृष्टि का आधार। कारण भी है। अक्षर सृष्टि के तीन प्राण ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ही क्षर सृष्टि का हृदय बनते हैं। इन्हीं की शक्ति रूपा सरस्वती, लक्ष्मी, काली प्रकृति रूप में कार्य करती है। इन सब प्राणों की सहायता से वाक् रूप क्षर सृष्टि उत्पन्न होती है। इस सृष्टि के कर्ता पुरुष रूप हृदय तथा प्रकृति रूप शक्तियां ही होती है। इन्हीं का स्थूल रूप नर-मादा दिखाई देता है। एक में पुरुष का बाहुल्य है, दूसरे में माया का।
सृष्टि की हर रचना का यही स्वरूप है। हर रचना माया से आवरित ब्रह्म है। न कहीं अकेला ब्रह्म होता है, न ही अकेली माया। इसीलिए अद्र्धनारीश्वर कहा जाता है। नर में ब्रह्म भाव तथा मादा में माया भाव का बाहुल्य रहता है। यही शरीर में भेद का कारण, संवत्सर जनित, बनता है। इन शरीरों का संचालन भी सूर्य, चन्द्रमा तथा ऋतुएं ही करती हंै। शरीर के भीतर सभी कोष अदृश्य, अति सूक्ष्म तथा प्राण-स्पन्दन रूप हैं। इनके कार्य एवं नियंत्रण शरीर में परिलक्षित होते हैं। शरीर ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है, प्रतिनिधि है, ब्रह्म तक पहुंचने का प्रवेश द्वार है।
ब्रह्म निष्कल है, निष्काम है, अशरीरी है। अत: अनिर्वचनीय है। ब्रह्म कुछ करता भी नहीं है। ब्रह्म जब आत्मा रूप में प्रकट होता है तब इसके दो धातु बन जाते हैं-ब्रह्म और कर्म। ब्रह्म साक्षी भाव में केवल देखता है, जानता है। जीव भाव में कर्म रहता है। गीता ब्रह्म और कर्म की व्याख्या का महासागर है। यदि सारा पुरुष भाव ही निष्काम हो जाए, निष्कल हो जाए तो सृष्टि क्रम आगे कैसे बढ़ेगा। माया कहां होगी?
प्रकृति में सूर्य की पिता संज्ञा है। चन्द्रमा मन का स्वामी और सूर्य पत्नी कहलाता है। पृथ्वी, गंगा, तुलसी आदि भी सूर्य की पत्नियां हैं। सूर्य से महत्, महत् से अहंकार और अहंकार से बुद्धि उत्पन्न होती है। नर बुद्धि प्रधान है। मादा मनस्वी है। दोनों के जीवन का धरातल भिन्न है। आवश्यकताएं भिन्न हैं। पुरुष आवरित होता है, स्त्री आवरित करती है। ब्रह्म और माया का, प्रकृति-पुरुष का यही मूल सूत्र है। पुरुष जैसे ही आवरणों को समझता जाता है, उनसे मुक्त होता जाता है। माया के बन्धन खुलते जाते हैं। माया ही बन्धन और मुक्ति का हेतु है। अन्त में माया ही ब्रह्म में लीन हो जाती है। माया का खेल और ब्रह्म की लीला समाप्त हो जाती है।
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
