
धर्म के आधार पर नफरत फैलाना नहीं है देशभक्ति
धर्म के आधार पर नफरत फैलाना नहीं है देशभक्ति
आर.एन. त्रिपाठी
प्रोफेसर, समाजशास्त्र, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और सदस्य, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग
देशभक्ति का मतलब है देश के साथ प्रेम, देश के नागरिकों के साथ प्रेम, देश की संस्थाओं के साथ प्रेम। देशभक्ति का मतलब है कि हमारे विचार, व्यवहार, कार्य द्ग सबमें देश सर्वोपरि हो, न कि व्यक्ति या कोई धर्म। भारतीय राष्ट्र की अवधारणा में लोक चेतना और लोकहित प्रमुख रहा है, जिसका एक मात्र उद्देश्य मानव कल्याण है। जितने भी धर्म ग्रंथ हैं, चाहे वे किसी भी संप्रदाय के हों, सबका निचोड़ मानवता का संरक्षण करना ही है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में सभी नागरिकों को अपनी पसंद की उपासना पद्धति और उसका पालन करने का अधिकार दिया गया है। यह अधिकार व्यक्ति को इतनी स्वतंत्र नहीं देता कि वह दूसरे के धर्म की उपासना पद्धति में व्यवधान डाले। एक पत्र में महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि हिंदुत्व के कारण ही मैं ईसाई, इस्लाम और अन्य धर्मों से प्रेम करता हूं। यह हिन्दू दर्शन लोकमंगल का दर्शन है। इसी के आधार पर हम समस्त धर्मों को एक समान मानते हैं। ठीक इसी प्रकार कुरान, गुरुग्रंथ साहिब व बाइबिल में मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म सम्पूर्ण मानवता की रक्षा करना ही बताया गया है।
विगत कुछ समय से धार्मिक यात्राओं और दूसरे आयोजनों को लेकर जिस प्रकार की खबरें आ रही हैं, वे भारत की मूल भावना के खिलाफ हैं। हमारा भारतीय संविधान एक ऐसा दस्तावेज है, जो प्रत्येक धर्म समुदाय को एक साथ रहने, अपनी पूजा पद्धति अपनाने और उसका पालन करने का अधिकार देता है। मुश्किल यह है कि इस समय इस देश में एक प्रकार की धार्मिक कट्टरता या यों कहें निर्ममता-सी आ गई है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति पहली बार पैदा हुई है। पहले भी ऐसी स्थितियां पैदा हुई हैं, लेकिन तब कोई न कोई महापुरुष इस विभेद को खत्म करने के लिए आगे आया।
आज विडंबना है कि जहां हम समान नागरिक अधिकारों की प्रतिष्ठा की तरफ बढ़ रहे हैं, वहीं ऐसी स्थिति आ रही है कि हम एक-दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं। इससे बचना होगा। भारत में दुष्प्रचार आज चरम पर है। किसी भी व्यक्तिके बयान को तोड़-मरोड़ कर, किसी भी दृश्य को अपने मनचाहे परिदृश्य से जोड़ कर ऐसा अभियान चलाया जा रहा है, जिससे विभेदकारी शक्तियों को अवसर मिल रहा है। इससे बचना होगा। भारत में तुलसी, रहीम, नानक, रसखान, रविदास सब एक-दूसरे के स्वर में ही सुर मिलाते रहे हैं। अजमेर शरीफ में मुस्लिमों के साथ हिन्दू भी खूब जाते हैं। कुम्भ जैसे धार्मिक मेलों की व्यवस्था संभालने में मुस्लिम कामगारों की प्रमुख भूमिका होती है। हमको इस विरासत को बचाना होगा।
धार्मिक कट्टरता के चलते होने वाली हिंसा और कटुता को रोकने में पुलिस और प्रशासन की सक्रियता तो जरूरी है ही, लोगों में मानवीय गुणों के प्रति अनुराग पैदा करना भी आवश्यक है। धर्म के नाम पर फैल रही नफरत से भारत माता की आत्मा घायल हो रही है। सर्वधर्म समभाव का उच्च आदर्श हाशिए पर धकेला जा रहा है। आज राष्ट्रहित की भूमिका को तिलांजलि देकर धर्म के आधार पर बयान दिए जा रहे हैं। कुछ धार्मिक नेता मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करके लोगों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। इस उन्माद की दावाग्नि भारत की युवा पीढ़ी को जलाती जा रही है।
भारत की संस्कृति मनुष्य ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के कल्याण की बात करती है। इसमें किसी भी धर्म उपासना पद्धति के नाम पर कोई भी भेद नहीं है, सबको समानता प्राप्त है। इसी विचार को आगे बढ़ाना होगा। किसी भी धर्म की उपासना पद्धति और पूजा पद्धति में व्यवधान न हो। इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विश्व का नेतृत्व करने की तैयारी करने वाला देश अपने ही बनाए विद्वेष के जाल में न उलझ जाए। आज समूचा विश्व भारत की तरफ टकटकी लगाए देख रहा है।
हमारे अगल-बगल के देशों में जिस प्रकार कट्टरता और विद्वेष की आग फैल रही है, उससे बचना होगा। आजकल अतिवादी बयानों से भी बहुत ज्यादा वैमनस्य फैलता चला जा रहा है। इस प्रवृत्ति को भी रोकना होगा। अब समय आ गया है कि सर्वहित देखते हुए देश के प्रबुद्ध नागरिक आगे आएं और नफरत भरी आंधी से देश को मुक्ति दिलाएं। हमारे छोटे-छोटे प्रयास भी धर्म के नाम पर फैल रही हिंसा और नफरत की आग पर काबू पाने में बहुत उपयोगी साबित होंगे।
Published on:
04 May 2022 08:29 pm
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