
पाक-चीन आर्थिक गलियारे के खिलाफ कदम जरूरी
आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान की चीन के साथ गलबहियां बढ़ती जा रही हैं। भारत की आपत्तियों के बावजूद दोनों देश चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना के दूसरे चरण पर काम करने को सहमत हो गए हैं। परियोजना चीन के बेल्ट एंड रोड परियोजना का हिस्सा है, जिसके तहत वह दक्षिण-पूर्व और मध्य एशिया के साथ-साथ खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका से यूरोप तक जमीन और समुद्री नेटवर्क का जाल बिछाने में जुटा है। सीपीईसी के लिए चीन से हाथ मिलाना कर्ज में डूबे पाकिस्तान की मजबूरी है।
हाल ही संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान को दो अरब डॉलर का कर्ज रोक दिया था। पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए चीन से भारी कर्ज ले चुका है। अब उसने दो अरब डॉलर का कर्ज और मांगा है। पुराना कर्ज चुकाने की समय सीमा 23 मार्च को खत्म होने वाली है। उससे पहले ही पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवर उल हक काकर ने चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग को पत्र लिखकर समय-सीमा बढ़ाने के साथ नए कर्ज की मांग रख दी है। कर्ज देकर जाल में फंसाने की चीन की नीति से पाकिस्तान भी वाकिफ है, लेकिन आर्थिक संकट में चीन उसे सबसे बड़ा मसीहा लग रहा है। सीपीईसी चीन के उत्तर-पश्चिमी झिंजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र और पाकिस्तान के पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोडऩे वाला 3,000 किलोमीटर लंबा मार्ग होगा। चीन का दावा है कि इस परियोजना का मकसद ऊर्जा, औद्योगिक, बुनियादी ढांचा विकास के साथ राजमार्गों, रेल और पाइपलाइन के नेटवर्क के जरिए पूरे पाकिस्तान में कनेक्टिविटी बढ़ाना है। चीन यहां भी 'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' वाली तिरछी चाल चल रहा है। दरअसल, ग्वादर बंदरगाह से वह अपने लिए मध्य-पूर्व, हिंद महासागर और अफ्रीका के नए रास्ते खोलना चाहता है। पाकिस्तान में सियासी पार्टियां और पर्यावरण विशेषज्ञ सीपीईसी का विरोध यह कहकर करते हैं कि इससे अंदरूनी मामलों में चीन का दखल बढ़ेगा। साथ ही, वनों की कटाई, जैव विविधता को नुकसान और वायु-जल प्रदूषण जैसे नकारात्मक पर्यावरणीय नतीजों से जूझना पड़ सकता है।
भारत सीपीईसी का विरोध करता रहा है, क्योंकि यह गिलगित-बाल्टिस्तान में पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरेगा। पीओके क्षेत्र में पाकिस्तान की निर्माण गतिविधियां भारत की संप्रभुता के हित में नहीं। इन नापाक मंसूबों के खिलाफ भारत को रणनीतिक कदम उठाते हुए समान विचारधारा के एशियाई देशों को भरोसे में लेकर विरोध दर्ज कराना होगा।
Updated on:
28 Jan 2024 07:46 pm
Published on:
28 Jan 2024 07:45 pm
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