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प्रच्छन्न: विचलित

व ह तो फिर अभी विचार ही कर रही है; किंतु बात बल्लव के पास पहुंच गई तो वह कुछ सोचेगा भी नहीं।

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Super Admin

Jan 16, 2015

वह तो फिर अभी विचार ही कर रही है; किंतु बात बल्लव के पास पहुंच गई तो वह कुछ सोचेगा भी नहीं। अपने क्रोध में वह अभी ही कोई अनर्थ कर बैठेगा।

परिणामस्वरूप कीचक के हाथों उनका कोई अहित हो या न हो, सैरंध्री और बल्लव ही, इस अज्ञातवास के सारे श्रम और कष्टों पर पानी फेर देंगे। अब जब अज्ञातवास का वर्ष पूरा होने को आया है तो उसकी तनिक सी आशंका से सब नष्ट हो सकता है।

तो क्या वह बृहन्नला के पास चली जाए? उसे बताए? वह तो आवेश में कोई काम नहीं करता है। और कुछ नहीं तो वह उत्तरा के माध्यम से रानी पर दबाव डलवाए कि वे सैरंध्री को कीचक के प्रासाद में न भेजें? किंतु यदि रानी और बुरा मान गई? उत्तरा उनकी पुत्री ही तो है।

यदि वे उसका आग्रह न मानें तो? और फिर रानी तो केकय प्रदेश की माधवी की प्रतीक्षा कर रही होंगी। सैरंध्री का अपनी आशंका मात्र के आधार पर रानी की आज्ञा का पालन न करना और इधर-उधर भटकना, रानी को रूष्ट ही करेगा।

अभी कुछ भी ऎसा नहीं हुआ है, जिसके आधार पर वह किसी से अपने लिए न्याय अथवा रक्षा की मांग कर सके। बहुत संभव है कि ऎसा कुछ न ही हो। यह सब उसके भयभीत मन की दुष्कल्पनाएं मात्र ही हों। इससे तो अच्छा है कि वह सावधानी से जाए। कीचक को किसी प्रकार का कोई अवसर ही न दे और रानी के लिए माधवी लेकर तत्काल लौट आए। और फिर बृहन्नला ने भी तो कहा था कि संकट की स्थिति में वह कीचक को लुभाने का अभिनय कर, कुछ हाव-भाव दिखा उसे बहका भी तो सकती है।

सैरंध्री का विचलित मन अपने सखा कृष्ण को स्मरण कर रहा था। यदि कहीं कृष्ण तुम यहां आस-पास होते! किंतु इस बार तो तुम यह भी नहीं जानते कि तुम्हारी सखी कहां है। तुम्हारे मित्र और भाई कहां हैं। तुम उन्हें स्वयं खोज कर उनकी सहायता भी करना चाहोगे तो कैसे करोगे? तुम जानते ही नहीं कि वे लोग कहां हैं।

सहसा सैरंध्री को लगा कि उसके भीतर एक आश्वासन जन्म ले रहा है। कृष्ण क्या नहीं जानता? कृष्ण क्या जान नहीं सकता? कृष्ण के लिए क्या अज्ञात है? क्यों भयभीत हो कृष्णे! अर्जुन ने कहा था न कि तुम्हारे जैसी सती नारी के तेज के सम्मुख कौन-सा आततायी ठहर सकता है? कौन-सा परस्त्रीगामी लंपट तुम्हारी दृष्टि की अग्नि को सहन कर सकता है। तुम निर्भय हो कर जाओ सैरंध्री। तुम्हारा वेश बदला है किंतु तुम अब भी द्रुपदपुत्री कृष्णा ही हो जो अग्निकुंड में से जन्मी थी। तुम्हारा तेज अद्वितीय है। तुम कृष्ण की सखी हो कृष्णे। तुम निर्भय हो कर जाओ।

सैरंध्री कीचक के प्रासाद के द्वार पर ही रूक गई। उसे भीतर जाने की आवश्यकता ही क्या थी। वह द्वारपाल के निकट जाकर खड़ी हो गई। उसने वह पात्र उसकी ओर बढ़ा दिया, "महारानी ने मुझे भेजा है। यह पात्र लो और किसी को भेज कर महारानी के लिए केकय की माधवी मंगा दो।""आओ।" द्वारपाल उसे मार्ग दिखाता हुआ चल पड़ा। अब सैरंध्री के पास कोई विकल्प नहीं था।

द्वारपाल उसे जिस कक्ष में लाया, वहां सामने ही कीचक बैठा था। इसी बात से तो सैरंध्री डर रही थी। अब यह संभव नहीं था कि वह किसी दासी अथवा परिचारिका से माधवी लेकर लौट जाती।

"आओ सैरंध्री!" कीचक लहराता-सा अपने स्थान से उठा, "तुमने बहुत अच्छा किया कि तुम आ गई। बड़ी समझदार है सुदेष्णा, कि उसने तुम्हें भेज दिया।"

सैरंध्री के सम्मुख, अब सब कुछ स्पष्ट था... क्यों सुदेष्णा ने उसे भेजने की हठ की। क्यों उसे किसी परिचारिका अथवा रसोइए के पास न भेज कर, सीधे उस कक्ष में पहुंचाया गया, जहां कीचक बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके विरूद्ध षड्यंत्र रचा है, सुदेष्णा और कीचक ने...

"आओ, यहां मेरे साथ बैठो। माधवी का पान करो। आओ, मेरी स्वामिनी बन कर मेरा प्रिय कार्य करो।" उसने सैरंध्री के उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की, स्वयं ही बोला, "मैं अभी दासियों को आज्ञा देता हूं। वे तुम्हारे लिए सोने का हार लाएं, शंख की चूडियां लाएं, स्वर्णमय कर्णफूलों के जोड़े लाएं, मणि, रत्नों के आभूषण लाएं, रेशमी साडियां लाएं..."

"सेनापति! मुझे महारानी सुदेष्णा ने भेजा है। उन्हें प्यास लगी है। मैं उनके लिए केकय प्रदेश की माधवी लेने के लिए आई हूं।" सैरंध्री बोली, "वे मेरी प्रतीक्षा कर रही होंगी। मैं शीघ्र न पहुंची तो वे क्रुद्ध होंगी।..."
"तो ठीक है। किसी दासी को भेज देता हूं, वह सुदेष्णा को माधवी पहुंचा देगी। लाओ, यह पात्र मुझे दो।" वह सैरंध्री के एकदम निकट आ गया था।

सैरंध्री का मस्तिष्क बड़े वेग से दौड़ रहा था। यदि वह स्वर्णपात्र उसको पकड़ा देती है और कीचक वह किसी दासी को देने के लिए इधर-उधर होता है, तो वही समय होगा, जब उसे यहां से निकल भागना चाहिए।...

यह तो निश्चित ही है कि वह उसे माधवी नहीं देगा। उसे तो अंतत: खाली हाथ ही जाना है। तो वह अपने अपमान की प्रतीक्षा क्यों करे? शीघ्रातिशीघ्र यहां से निकल जाए और रानी को स्पष्ट कह दे कि वह उनकी इस प्रकार की आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकती। वे प्रसन्न हों अथवा अप्रसन्न। वह व्यभिचारिणी हो कर उनकी चाकरी नहीं करेगी।
क्रमश: नरेन्द्र मोदी