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प्रच्छन्न : संकेत

वे अपने भाई से सैरंध्री की रक्षा कर पाएंगी क्या? "कैसे हैं भैया?

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Super Admin

Jan 16, 2015

वे अपने भाई से सैरंध्री की रक्षा कर पाएंगी क्या? "कैसे हैं भैया?" सुदेष्णा ने कीचक का ध्यान सैरंध्री की ओर से हटाने का प्रयत्न किया। "मैं प्रसन्न हूं, सुखी हूं, आनन्दित हूं; किंतु देख रहा हूं, कि तुम तो मुझसे भी बहुत अधिक सुख की स्थिति में हो।"

सुदेष्णा की सहज प्रतिक्रिया थी कि वह पूछे कि ऎसी क्या बात है कि जिसके कारण वह उन्हें परम सुख की स्थिति में पा रहा है। किंतु पूछने की कोई आवश्यकता थी नहीं। वे समझ रही थीं कि उनके भाई का संकेत किस ओर था। "हां! मैं तो परम सुख की स्थिति में हूं ही।"

सुदेष्णा ने कहा, "जिस बहन के वीर भैया उसे सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराने को तत्पर बैठे हों, वह बहन तो परम सुख की स्थिति में होगी ही।"

"अरे छोड़ो बहना! तुम भी क्या बातें ले बैठीं। कीचक ने कुछ ऊबे हुए स्वर में कहा, "मुझे बताओ कि मेरी अनुपस्थिति में पीछे क्या-क्या होता रहा है यहां?" "क्या होना था भैया!" सुदेष्णा बोलीं, "आप नहीं होते तो विराटनगर का जीवन जैसे थम ही जाता है। कोई गति-विधि ही नहीं रहती।" "सुदेष्णे! मैं कल संध्या समय ही विराटनगर में आ गया था।" कीचक बोला।

"जानती हूं।" "और यह भी जानती होगी कि जब मैं विराटनगर में उपस्थित नहीं भी होता, तो नगर में पीछे मेरी रानियां और मेरे भाई होते हैं। उनके अतिरिक्त मेरे कुछ आज्ञाकारी तथा निष्ठावान सेवक भी यहीं रहते हैं।" कीचक सीधे उसकी आंखों में देख रहा था, जैसे वह विराटनगर की रानी न हो, उसकी कोई दासी हो, "और तुम यह भी जानती होंगी सुदेष्णे! कि उनमें कोई भी बहरा, गूंगा अथवा अंधा नहीं है।"

"तो?" सुदेष्णा ने कुछ साहस करके पूछा। "तो मुझे पीछे के सारे समाचार मिलते रहते हैं। मैं विराटनगर से बाहर जाता हूं तो भी अपने अनेक नेत्र यहां छोड़ जाता हूं।"

सुदेष्णा अनुभव कर रही थीं कि वे मन ही मन कीचक से आतंकित होती जा रही हैं। इस प्रकार तो वे कभी अपने पति से भी आतंकित नहीं हुई, जो राजा हैं, और जिनसे कोई न कोई मतभेद होता ही रहता है। और यह भाई, जिसके भरोसे वे अपने पति और इस राज्य के राजा से टकरा जाने में भी कोई संकोच नहीं करतीं, वह ही उन्हें आतंकित कर रहा है।

सुदेष्णा ने जैसे अपना सारा आत्मबल बटोरा, "ऎसा कौन-सा समाचार आपको मिल गया, जिसके कारण आप मुझे इस प्रकार आंखें दिखा रहे हैं?" "मुझसे पूछे बिना कंक की नियुक्ति किसने की?" "यह तो आपको महाराज से पूछना चाहिए।" सुदेष्णा कुछ आश्वस्त हुई, "राजसभा की नियुक्तियां मेरे अधीन नहीं हैं।"

"वह तो मैं राजा से पूछूंगा ही।" कीचक बोला, "मैं तो केवल इतना बता रहा था कि विराटनगर में पीछे और भी बहुत कुछ हुआ है।" रानी को अपने भाई का यह व्यवहार तनिक भी अच्छा नहीं लग रहा था किंतु वह कीचक का स्वभाव जानती थी।

इस समय उसे कुछ भी कहना व्यर्थ था। बात टाल कर बोली, "मैं नहीं जानती थी कि राजसभा में राजा के एक द्यूत-सहचर की नियुक्ति इतनी बड़ी घटना थी कि भाई के नगर में लौटते ही बहन का दायित्व था कि वह उसका कुशल समाचार भी न पूछे और उसे उसकी सूचना दे।"

"क्यों एक द्यूत-सहचर ही क्यों?" कीचक बोला, "पाकशाला का नया अध्यक्ष भी नियुक्त किया है, राजा ने।"

"हां! नियुक्त किया है।" सुदेष्णा ने पहली बार सीधे कीचक की आंखों में देखने का दुस्साहस किया, "राजा हो कर भी उन्होंने कभी आपसे नहीं पूछा कि आपका कौन-सा काम कौन-सा सेवक करता है, और आपने कौन-सा सेवक क्यों नियुक्त किया है; और आप सेनापति होकर भी राजा से पूछने का साहस कर रहे हैं कि उसने अपनी रसोई में नया रसोइया क्यों रखा?" सुदेष्णा ने कीचक को कुछ कहने का अवसर नहीं दिया, "और इसको नया रसोइया रखना कहते हैं? पाकशाला का पुराना अध्यक्ष तुम्हारे सैनिकों के दुर्व्यवहार से दुखी हो चुका था। वह अपना पद स्वयं ही छोड़ जाना चाहता था।..."
क्रमश: नरेन्द्र कोहली