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Patrika Opinion: सार्वजनिक परिवहन तंत्र को मजबूत करें

यातायात अवरुद्ध होने की इसी समस्या को देखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलूरु शहर में स्कूलों, कारखानों, कंपनियों, सरकारी दफ्तरों व अन्य व्यापारिक संस्थाओं के समय और काम के घंटों की समीक्षा करने का सुझाव दिया है।

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Nitin Kumar

Sep 13, 2023

Patrika Opinion: सार्वजनिक परिवहन तंत्र को मजबूत करें

Patrika Opinion: सार्वजनिक परिवहन तंत्र को मजबूत करें

सुधार के तमाम उपायों के बावजूद महानगरों और बड़े शहरों में सड़क मार्ग पर रेंगते यातायात की समस्या आम है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब लोग जाम हुए यातायात के बीच नहीं फंसते हों। बढ़ती आबादी और सार्वजनिक परिवहन की उस अनुपात में व्यवस्था नहीं होना इस समस्या की बड़ी वजह है, यह सब जानते हैं। यातायात अवरुद्ध होने की इसी समस्या को देखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलूरु शहर में स्कूलों, कारखानों, कंपनियों, सरकारी दफ्तरों व अन्य व्यापारिक संस्थाओं के समय और काम के घंटों की समीक्षा करने का सुझाव दिया है।

जाहिर है कि जब दफ्तर-फैक्ट्रियों व अन्य संस्थानों के काम शुरू करने व समाप्त करने का वक्त एक ही होगा तो यातायात का दबाव बढ़ेगा ही। हाईकोर्ट के इस सुझाव के पीछे यही मंशा लगती है कि कामकाज के वक्त में सुबह-दोपहर-शाम का अलग-अलग समय वहां तो तय हो ही जाना चाहिए जहां ऐसा करने में कोई मुश्किल न आती हो। दफ्तरों व प्रतिष्ठानों का अलग-अलग समय होगा तो यातायात का दबाव भी कम होगा। देखा जाए तो रेंगता हुआ यातायात आज शहरी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा हो गया है। यह ऐसी समस्या बन गया है, जिसको दूर करने के लिए हर उपाय बेअसर होता जा रहा है। यह समस्या तब विकराल रूप धारण कर लेती है, जब किसी शहर के अतिव्यस्त समय, खासकर स्कूल या ऑफिस के वक्त सड़कों पर वाहनों की आवाजाही ज्यादा होती है। ऐसे में पूरा शहर यातायात अवरुद्ध होने के संकट से जूझता दिखता है। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि इस समस्या के समाधान के लिए शहरों ने कोई कदम नहीं उठाए। पर ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया की तर्ज पर ये उपाय आधे-अधूरे ही नजर आते हैं।

सड़कों पर रेंगते यातायात से ईंधन की बर्बादी तो होती ही है, वायु प्रदूषण के साथ ही ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी होता है। बड़ा संकट शहरों में सार्वजनिक परिवहन का प्रभावी प्रबंध नहीं होने का भी है। शहरों में खराब सड़क प्रबंधन और समुचित बुनियादी ढांचे की कमी तो कोढ़ में खाज साबित होने लगी है। समय-समय पर विशेषज्ञ भी चेताते रहे हैं कि सडक़ों पर जिस तरह से निजी वाहनों का दबाव बढ़ता जा रहा है, हालात और विस्फोटक होते देर नहीं लगेगी। ऐसे में हर शहर के नियोजकों को अभी से ऐसी प्रणाली विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा, जो इस संकट से निजात दिलाने का काम करे। वाहनों को साझा करने के साथ सार्वजनिक परिवहन बंदोबस्त की मजबूती इस समस्या को एक हद तक दूर करने में सफल हो सकती है।