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जहर पर लगे रोक

सरकार को कीटनाशकों के आम जरूरत की वस्तुओं में इस्तेमाल के कड़े नियम-कानून बनाने होंगे। इनसे होने वाले नुकसान का संज्ञान न्यायपालिका भी ले।

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Sunil Sharma

Aug 13, 2018

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हमारी जिंदगी को रासायनिक तत्वों से लगातार खतरा बढ़ रहा है। खाने-पीने से लेकर सौंदर्य प्रसाधन और अन्य वस्तुओं में रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है। इससे कैंसर, हृदय और मस्तिष्क संबंधी बीमारियां हो रही हैं। लेकिन कंपनियां बड़े मुनाफे के चलते विकासशील और खेती पर निर्भर देशों को निशाना बना रही हैं। विकसित देशों में जरूर इनके खिलाफ जागरूकता दिखने लगी है। हाल ही कैलिफोर्निया की सेन फ्रांसिस्को सुपीरियर कोर्ट ने एक फैसले में खरपतवारनाशक रसायन का निर्माण करने वाली विश्व की बड़ी बीज एवं कीटनाशक निर्माता कंपनी मोनसेंटो पर २ हजार करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। कंपनी को पीडि़त माली ड्वेन जॉनसन को यह राशि हर्जाने के रूप में देनी होगी। उसे खरपतवारनाशक में प्रमुख ग्लाइफोसेट रसायन के दुष्प्रभाव से कैंसर हो गया।

कोर्ट ने मोनसेंटो को जिम्मेदार माना। अकेले अमरीका में कंपनी के खिलाफ पांच हजार से ज्यादा मामले न्यायालयों में चल रहे हैं। कई प्रांतों में इस पर प्रतिबंध भी लगाया गया है। भारत में भी खेती को बढ़ाने के लिए कीटनाशकों तथा हाइब्रिड बीजों के उपयोग में तेजी से वृद्धि हुई है। पिछले २० सालों में देश में कैंसर जैसे घातक रोगों से पीडि़तों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में कैंसर के मरीजों में बेहताशा वृद्धि हुई है। आधुनिक खेती की जानकारी नहीं होने के कारण हमारे किसान उपज बढ़ाने के लिए कीटनाशक कंपनियों के झांसे में आ जाते हैं। ऐसे में वे कर्ज के साथ जानलेवा रोग भी पाल लेते हैं। पंजाब से बीकानेर आने वाली एक ट्रेन का तो नाम ही कैंसर ट्रेन हो गया है। इसमें सफर करने वाले ज्यादातर कैंसर मरीज ही होते हैं। ऐसे हालात इसलिए बन रहे हैं क्योंकि सरकार की ओर से भी विदेशी कंपनियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्नत बीजों के साथ शर्त रखी जाती है कि अमुक कीटनाशक खरीदकर छिडक़ाव करना होगा तभी फसल अच्छी होगी। थोड़े से लाभ के लिए किसान ही नहीं, उपज का उपभोग करने वाले नागरिकों की जान से भी खिलवाड़ किया जा रहा है।

खेती ही नहीं, टूथपेस्ट, परफ्यूम स्प्रे, फिनाइल, दर्दनाशक तेल आदि में भी खतरनाक रसायनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। जिस गति से इनका इस्तेमाल हो रहा है, उस गति से इन पर अंकुश लगाने या आम जन में जागरूकता पैदा करने के प्रयास नहीं किए जा रहे। यही कारण है कि मोनसेंटो भारत में करीब 700 करोड़ रुपए का कारोबार करती है। इसका एक कीटनाशक ‘राउंड-अप’ जो कि सार्वजनिक स्थलों पर इस्तेमाल होता है, की वार्षिक बिक्री ही 190 करोड़ रुपए तक की होती है। यह मोनसेंटो के भारत में कुल व्यापार का २८ प्रतिशत है। इस आंकड़े से साफ है कि हम कितना जहर इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार को कीटनाशकों के आम जरूरत की वस्तुओं में इस्तेमाल के कड़े नियम-कानून बनाने होंगे। साथ ही इनसे होने वाले नुकसान का संज्ञान न्यायपालिका भी ले तो काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। आखिर स्वस्थ नागरिकों से ही देश के विकास की परिकल्पना की जा सकती है।