
sugarcane farmer
- एसएस आचार्य, कृषि अर्थशास्त्री
केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट हारने के बाद गैर-सरकारी चीनी मिलों को 7000 करोड़ का बेलआउट पैकेज दिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि गैर-सरकारी क्षेत्र की चीनी मिलों को जबर्दस्त घाटा झेलना पड़ रहा है। वर्ष 2017-18 सीजन के दौरान चीनी का बंपर उत्पादन 360 लाख टन हुआ और इसके दाम साल भर नीचे ही रहे। इससे चीनी मिलों पर दबाव पडऩे लगा और उन्होंने विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का पैसा रोकना शुरू कर दिया।
उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की बकाया देनदारी (एरियर) बढ़ती हुई 12 हजार करोड़ रुपए के पार चली गई। महाराष्ट्र और कर्नाटक में यह बकाया देनदारी तीन-तीन हजार करोड़ रुपए तक ही है। यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की इस बकाया देनदारी में बड़ी हिस्सेदारी कैराना के गन्ना किसानों की थी। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के कैराना लोकसभा सीट गंवाने के पीछे गन्ना किसानों की नाराजगी एक प्रमुख कारण रही।
बहरहाल, राजनीतिक हार-जीत का गणित जो भी हो, लेकिन गन्ना किसानों के चीनी मिलों पर बकाया (एरियर) का एक राजनीतिक अर्थशास्त्र जरूर है। इसे समझने के लिए जरूरी है कि हम गन्ने की फसल की प्रकृति को समझें। गन्ना आम अनाज और दलहन से अलग तीन साल की फसल है। पहली बार इसकी बुआई के बाद इसका क्षेत्र कम नहीं होता। इसका कारण यह है कि गन्ने की एक ही फसल लगातार तीन साल तक चलती है। इस फसल के चार इस्तेमाल होते हैं। इसका बीज नहीं होता, इसलिए इसका पहला इस्तेमाल बुआई के लिए होता है। दूसरा इस्तेमाल ताजा रस निकालने के तौर पर। तीसरा इस्तेमाल गुड़ तैयार करने में और चौथा चीनी उत्पादन के लिए।
चीनी उत्पादन में करीब नब्बे फीसदी गन्ना इस्तेमाल होता है। चूंकि कटाई के दो या तीन दिन में ही यह सूखने लगता है और रस की मात्रा घटने लगती है, इसलिए खरीदार निकटवर्ती चीनी मिलें ही होती हैं। ढुलाई करके इसे दूर की चीनी मिल तक ले जाना जोखिमपूर्ण होता है क्योंकि गन्ने की कीमत उसमें रस की मात्रा के आधार पर मिलती है। इन हालात में किसान के पास इसकी बिक्री का अन्य विकल्प नहीं होता।
खरीदार एक ही चीनी मिल हो तो किसानों के शोषण की आशंका बहुत अधिक रहती है। चीनी मिलें किसानों का शोषण न करें, इसके लिए सरकारी दखल जरूरी हो जाता है। सरकार की कोशिश होती है कि किसानों को उनके गन्ने का उचित मूल्य मिले। इसके लिए वह फेअर एंड रिम्युनरटिव प्राइस (एफआरपी) घोषित करती है। इस तय एफआरपी पर ही मिलें किसानों से उनका गन्ना खरीदती हैं। इसके साथ सरकार चीनी मिलों की माली हालत का भी ध्यान रखती है ताकि वे किसानों को गन्ने का उचित मूल्य दे सकें।
देश में चीनी मिलें तीन तरह की हैं। एक सरकारी चीनी मिलें हैं, जिनकी संख्या बेहद कम है। दूसरी सहकारी चीनी मिलें हैं, जो अधिकतर महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर कर्नाटक में हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में अधिकतर गैर-सरकारी चीनी मिलें ही हैं। हम यदि सहकारी और गैर-सरकारी चीनी मिलों की बात करें तो सहकारी चीनी मिलें आमतौर पर बेहतर काम करती हैं। वे समय पर गन्ना किसानों को उनकी उपज की कीमत देती हैं और उत्पादन के बाद लाभ का एक अंश सदस्यों को, जो किसान ही होते हैं, उपलब्ध कराती हैं। लेकिन, सबसे अधिक समस्या गैर-सरकारी चीनी मिलों के साथ है। ये मिलें किसानों से एफआरपी पर एक समय तक तो गन्ना खरीदती हैं। लेकिन जब लाभ में हिस्सेदारी की बात आती है तो बाजार में चीनी के दाम कम होने, उत्पादन अधिक होने जैसी कारण गिनाकर खातों में घाटा दिखाती हैं। उनकी कोशिश सरकार से अधिकाधिक प्रोत्साहन राशि हासिल करने की होती है।
कुछ राज्य सरकारें भी मिलों के उत्पादन पर लाभ के मद्देनजर गन्ने की कीमत की घोषणा करती हैं जिसे स्टेट एडवाइजरी प्राइस (एसएपी) कहते हैं। घाटा दिखाने वाली चीनी मिलों को इस दर पर गन्ने की कीमत देने में परेशानी होती है। ऐसे में ये मिलें किसानों का पैसा बकाया रखने लगती हैं। यह बकाया देनदारी जब धीरे-धीरे बढऩे लगती है, तब सरकार पर भी दबाव बढऩे लगता है।
एक ओर किसान जल्द से जल्द मिलों से बकाया रकम लेना चाहते हैं तो दूसरी ओर मिल मालिक जल्द से जल्द घाटे पूर्ति। घाटे की भरपाई होने पर ही वे किसानों को बकाया राशि चुकाने की बात करते हैं। गन्ने और चीनी का परस्पर अर्थचक्र घूमता रहे, इसके लिए सरकार मिलों को धन मुहैया कराती है। कभी चीनी का बफर स्टॉक रखने के लिए तो कभी चीनी उत्पादन के दौरान तैयार हुए सह उत्पादों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए। सरकार ने हाल में चीनी मिलों को बेलआउट पैकेज दिया है। चीनी मिलें इस राशि में से किसानों की कितनी बकाया देनदारी चुकाएंगी और सत्तारूढ़ भाजपा इस फैसले को चुनावों के दौर में अपने पक्ष में कितना भुना पाएगी, यह देखना होगा।

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